तिरुवनंतपुरम: वरिष्ठ इतिहासकार के. एन. पणिक्कर का निधन हो गया। सोमवार को तिरुवनंतपुरम के एक निजी अस्पताल में उम्र संबंधी बीमारियों के कारण 89 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से वामपंथी इतिहास लेखन की एक महत्वपूर्ण परंपरा को बड़ा झटका लगा है।
जीवनभर सांप्रदायिकता के खिलाफ मुखर रहने वाले पणिक्कर ने आधुनिक भारत के इतिहास को पढ़ने और समझने के तरीके को नई दिशा दी। उनका जन्म 26 अप्रैल 1936 को ब्रिटिश भारत के मद्रास प्रेसीडेंसी के गुरुवायूर (अब केरल) में हुआ था।
उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अध्यापन कार्य शुरू किया। अपने लंबे शिक्षकीय जीवन में उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) सहित देश-विदेश के कई शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाया।
वे केरल के श्री शंकराचार्य विश्वविद्यालय के कुलपति और राज्य के उच्च शिक्षा परिषद के अध्यक्ष भी रहे। इसके अलावा वे केरल काउंसिल फॉर हिस्टोरिकल रिसर्च के अध्यक्ष भी थे। वर्ष 2008 में वे इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे।
आधुनिक भारत का इतिहास, औपनिवेशिकता और सांप्रदायिकता के इतिहास पर उनकी लिखी किताबें इतिहास के शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। उन्होंने तर्क और तथ्यों के आधार पर इतिहास को समझने और उसकी व्याख्या करने के लिए जीवनभर संघर्ष किया।
विशेष रूप से भारत के इतिहास को सांप्रदायिक दृष्टिकोण से देखने की प्रवृत्ति के वे कड़े विरोधी थे। उनके निधन पर केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और सीपीएम के राज्य सचिव एम. वी. गोविंदन ने शोक व्यक्त किया।
मुख्यमंत्री विजयन ने अपने शोक संदेश में लिखा कि “भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को बदलने की साजिश और शिक्षा व्यवस्था के भगवाकरण के खिलाफ पणिक्कर एक मजबूत आवाज थे। उनका निधन लोकतांत्रिक मूल्यों और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा की लड़ाई के लिए बड़ा आघात है।”