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पश्चिम एशिया में युद्ध में उलझे भारत के दो मित्र देश, क्या बढ़ रही है नई दिल्ली की चिंता?

भारत की विदेश नीति की एक प्रमुख विशेषता है रणनीतिक संतुलन बनाए रखना।

By अंशुमान गोस्वामी, Posted by डॉ. अभिज्ञात

Mar 01, 2026 19:22 IST

नयी दिल्लीः पश्चिम एशिया में इज़राइल और ईरान के बीच संघर्ष भयावह रूप ले चुका है। यह टकराव केवल क्षेत्रीय तनाव ही नहीं बढ़ा रहा, बल्कि भारत जैसे देशों के लिए जटिल कूटनीतिक संतुलन का प्रश्न भी खड़ा कर रहा है। कारण यह है कि भारत के इन दोनों देशों के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं।

भारत की विदेश नीति की एक प्रमुख विशेषता है रणनीतिक संतुलन बनाए रखना। एक ओर इज़राइल भारत का रक्षा, प्रौद्योगिकी और खुफिया सहयोग में अहम साझेदार है- दूसरी ओर ईरान भारत की ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क और मध्य एशिया तक पहुंच के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इज़राइल के साथ भारत के संबंध

इज़राइल भारत का एक प्रमुख रक्षा सहयोगी है। ड्रोन, मिसाइल रक्षा प्रणाली, निगरानी तकनीक और सीमा सुरक्षा में दोनों देशों के बीच घनिष्ठ सहयोग है। इसके अलावा विभिन्न तकनीकी क्षेत्रों में भी इज़राइल भारत का महत्वपूर्ण भागीदार है। इस संघर्ष के दौरान भारत के सीधे इज़राइल के खिलाफ रुख अपनाने की संभावना कम है। हालांकि स्थिति बिगड़ने पर भारत शांति की अपील कर सकता है।

प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर तनवीर अरशद के अनुसार इज़राइल के साथ भारत के संबंध ईरान की तुलना में अपेक्षाकृत नए हैं लेकिन तेजी से महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में इज़राइल भारत के लिए बड़ा सहारा बन गया है।

ईरान के साथ भारत के रणनीतिक संबंध

ईरान लंबे समय तक भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों से पहले भारत ईरान से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता था। इसके अलावा चाबहार बंदरगाह परियोजना भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक संपर्क स्थापित करती है।

इसलिए ईरान के साथ संबंध खराब होने पर भारत के क्षेत्रीय संपर्क और रणनीतिक हितों को नुकसान हो सकता है। तनवीर अरशद के अनुसार मध्य एशिया की रणनीतिक स्थिति को देखते हुए ईरान के साथ भारत के संबंध बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि दोनों देशों के संबंधों का इतिहास लंबा है।

इज़राइल–ईरान संघर्ष भारत के लिए सीधे सैन्य चुनौती शायद न बने लेकिन यह नई दिल्ली के लिए कूटनीतिक संतुलन की बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है। दोनों पक्षों के साथ संबंध बनाए रखने के लिए संतुलन आवश्यक है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कार्य में भारत का विदेश मंत्रालय पर्याप्त रूप से दक्ष है।

भारत आमतौर पर संघर्ष के बजाय संवाद, कूटनीतिक समाधान और क्षेत्रीय स्थिरता के पक्ष में रहता है। सीधे किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय वह संतुलित रुख अपनाता है। हाल के वर्षों में रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध में भी भारत की रणनीतिक स्थिति ने वैश्विक ध्यान आकर्षित किया था।

कूटनीतिक हलकों का मानना है कि इस मामले में भी भारत ‘मल्टी-वेक्टर फॉरेन पॉलिसी’ जैसा व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाएगा, जिससे वह दोनों पक्षों के साथ संबंध बनाए रख सके। हालांकि कूटनीतिक संबंधों को लेकर अधिक चिंता नहीं जताई जा रही, लेकिन युद्ध के कारण अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों पर असर पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा रहा है।

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