नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की अदालत में चंद्रलेखा सिंह द्वारा दायर मामले की सुनवाई पूरी हुई। वादी और प्रतिवादी दोनों ही फैसले का इंतजार कर रहे थे। तभी न्यायमूर्ति विद्यार्थी ने कहा कि मैं भूखा और थका हुआ हूं। शारीरिक और मानसिक रूप से फैसला सुनाने की स्थिति में नहीं हूं इसलिए इस मामले का फैसला सुरक्षित रख रहा हूं। जब उन्होंने यह बात कही तब घड़ी में शाम के 7 बजकर 10 मिनट हो रहे थे। आसपास की सभी अदालतें खाली हो चुकी थीं लेकिन उनकी अदालत में अब भी पर्याप्त भीड़ थी। न्यायाधीश की यह बात सुनकर कोई कुछ नहीं कह सका। फैसला सुरक्षित रखने की घोषणा कर वे अदालत से बाहर चले गए। इलाहाबाद हाईकोर्ट में इसी सप्ताह हुई इस घटना की गूंज दिल्ली स्थित देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट के सूत्रों के अनुसार, इस घटना के बाद देशभर की अदालतों में लंबित मामलों के भारी बोझ पर चर्चा शुरू हो गई है।
सर्वोच्च अदालत द्वारा तय समयसीमा के भीतर एक मामले का निपटारा करने की कोशिश कर रहे न्यायमूर्ति विद्यार्थी पर लगातार सुनवाई का दबाव था। दिनभर एक के बाद एक मामलों की सुनवाई से वे बेहद थक गए थे। पूरे दिन की व्यस्तता के कारण उन्हें अपनी अदालत में बैठकर कुछ खाने का भी अवसर नहीं मिला। पूर्ण फैसला सुरक्षित रखने से पहले उन्होंने बताया कि आज उनकी अदालत में 92 नए मामले, 101 पुराने मामले, 39 नए विविध आवेदन और 3 अनलिस्टेड मामले थे। पूरे दिन की कोशिश के बावजूद सूची में शामिल केवल 29 मामलों की सुनवाई पूरी हो सकी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन करते हुए इस मामले की सुनवाई शाम 4 बजकर 15 मिनट पर शुरू की गई और 7 बजकर 10 मिनट पर समाप्त हुई। इसके बाद फैसला सुनाने की शारीरिक स्थिति नहीं बची थी।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस समय देशभर में लंबित मामलों की संख्या लगभग साढ़े 5 करोड़ है। इनमें विभिन्न राज्यों के हाईकोर्ट में करीब 63 लाख मामले लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट में लगभग 88 हजार मामले लंबित हैं। निचली अदालतों में लगभग 4 करोड़ 70 लाख मामले लंबित हैं। 30 साल से अधिक पुराने मामलों की संख्या 1 लाख 80 हजार से ज्यादा है, जबकि 50 साल से चल रहे मामलों की संख्या 3,400 से अधिक है। इतने बड़े मामलों के बोझ को संभालने के लिए देश में पर्याप्त न्यायाधीश उपलब्ध नहीं हैं। जो हैं, उन पर असाधारण दबाव है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायमूर्ति विद्यार्थी की उस दिन की टिप्पणी में इसी दबाव की झलक दिखी।