नई दिल्लीः अमेरिकी बाल यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन (Jeffrey Epstein) की कुख्यात फाइल में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी (Hardeep Singh Puri) का नाम आने के बाद राजनीतिक गलियारों में काफी हंगामा मचा था। मामले को लेकर केंद्र सरकार ने तुरंत जांच शुरू की और मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार पुरी को क्लीनचिट दे दिया गया है।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि पुरी के खिलाफ कोई आपत्तिजनक या अपराध साबित नहीं हुआ, इसलिए उन्हें इस्तीफा देने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह मामला राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निगरानी में था क्योंकि एपस्टिन फाइल्स में दुनिया भर के कई प्रतिष्ठित नेताओं और अधिकारियों के नाम सामने आए हैं।
केंद्र का जवाब
‘इंडिया टुडे’ की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र ने पुरी के मामले में विस्तृत जांच और अभ्यंतर परामर्श किया। जांच में मंत्री के बयान को रिकॉर्ड किया गया और उनकी गतिविधियों का आंकलन किया गया। इसके बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक या अनुचित कार्यवाही साबित नहीं हुई।
सरकारी तर्क यह है कि सिर्फ एपस्टिन के साथ पेशेवर बैठकें और ईमेल आदान-प्रदान होना, बिना किसी अपराध प्रमाण के, किसी भी कार्रवाई का आधार नहीं बन सकता।
कांग्रेस की प्रतिक्रिया और पुरी का जवाब
विपक्षी दल कांग्रेस ने हरदीप पुरी के इस्तीफे की मांग की है। कांग्रेस का दावा है कि 2014 से 2017 के बीच पुरी और एपस्टिन के बीच 62 ईमेल और 14 बैठकें हुई थीं।
हालांकि पुरी ने इन आरोपों को राजनीतिक षडयंत्र करार दिया और स्पष्ट किया कि उन्होंने केवल 4 बैठकें की थीं, और सभी पेशेवर और सरकारी कार्य से संबंधित थीं। उन्होंने कहा कि ये बैठकें केवल भारत के हित और आर्थिक संभावनाओं से जुड़ी थीं।
एपस्टीन फाइल में दुनिया के दिग्गजों का नाम
विश्व स्तर पर एपस्टीन फाइल में कई नाम सामने आए हैं। इनमें कई नेता और प्रतिष्ठित लोग भी शामिल थे जिन्होंने नैतिक कारणों से इस्तीफा दे दिया, भले ही उनके खिलाफ कोई अपराध सिद्ध न हुआ हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में केंद्र का तर्क कानूनी दृष्टि से सही हो सकता है, लेकिन नैतिक और राजनीतिक दृष्टि से यह सवाल खड़ा करता है कि एक सजायाफ्ता अपराधी के साथ संपर्क में आना कितनी जिम्मेदारीपूर्ण नीति है।
पुरी को मामले में क्लीन चिट
हालांकि पुरी को क्लीनचिट मिल गई है, विपक्ष और मीडिया इस मामले पर सवाल उठाए रख सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि मामले को केवल कानूनी दृष्टिकोण से देखना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए नैतिक जिम्मेदारी और राजनीतिक संवेदनशीलता को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।