तिरुवनंतपुरम (केरल): पूर्व केंद्रीय मंत्री के. पी. उन्नीकृष्णन का सोमवार को कोझिकोड के एक निजी अस्पताल में 89 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे एक प्रमुख राजनीतिक हस्ती थे और 1989-90 में वी. पी. सिंह मंत्रिमंडल में परिवहन तथा सूचना एवं संचार मंत्री के रूप में कार्य कर चुके थे।
उन्नीकृष्णन की साहसिक भूमिका सराहनीयः केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन
केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने पूर्व केंद्रीय मंत्री के. पी. उन्नीकृष्णन के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “उन्नीकृष्णन धर्मनिरपेक्ष राजनीति के प्रबल समर्थक थे और पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने अपनी मजबूत छाप छोड़ी। एक सांसद के रूप में उन्नीकृष्णन ने बोफोर्स जैसे घोटालों को उजागर करने में संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह साहसिक भूमिका निभाई। विजयन ने 1990 के खाड़ी युद्ध के दौरान उनके नेतृत्व को अविस्मरणीय बताया।
उन्होंने कहा, “उन्नीकृष्णन ने कुवैत में फंसे डेढ़ लाख से अधिक मलयालियों को वापस लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। युद्ध के दौरान निकासी प्रक्रिया को तेज करने के लिए उन्होंने बगदाद में एक गुप्त केंद्र पर सद्दाम हुसैन से भी मुलाकात की थी। संकट की घड़ी में उनके दृढ़ और सिद्धांतवादी रुख की ओर पूरा देश देखता था। भारत की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष परंपरा की एक सशक्त आवाज़ को विनम्र श्रद्धांजलि।”
छह बार सांसद चुने गये
उन्नीकृष्णन 1971 से 1991 के बीच लगातार छह बार वडकारा लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए। एक कुशल राजनयिक और प्रख्यात वक्ता के रूप में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया।
धर्मनिरपेक्ष राजनीति को मजबूत किया
वी. पी. सिंह सरकार में वे कैबिनेट मंत्री रहे और दूरसंचार, शिपिंग तथा सतह परिवहन जैसे मंत्रालयों का दायित्व संभाला। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के नेतृत्व में उभरती आक्रामक हिंदुत्व राजनीति का कड़ा विरोध किया और देश में धर्मनिरपेक्ष राजनीति को मजबूत करने के लिए कार्य किया। 1991 के चुनावों में कांग्रेस-मुस्लिम लीग गठबंधन द्वारा समर्थित साझा उम्मीदवार के खिलाफ मुकाबला करते हुए भी उन्होंने वडकारा से वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) के उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की।
राजनीति में आने से पहले उन्नीकृष्णन पत्रकार थे
सक्रिय राजनीति में आने से पहले उन्नीकृष्णन पत्रकार के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने समाजवादी आंदोलनों के माध्यम से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। नेशनल यूनियन ऑफ स्टूडेंट्स ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और बॉम्बे समाजवादी युवक सभा के सचिव के रूप में कार्य करने के बाद वे 1960 में कांग्रेस में शामिल हुए। दिल्ली में उन्होंने वी. के. कृष्ण मेनन के साथ निकटता से काम किया और बाद में इंदिरा गांधी के करीबी सहयोगी बने। इंदिरा गांधी से मतभेद के बाद वे कांग्रेस (यू) और बाद में कांग्रेस (एस) में शामिल हुए, जहां वे अखिल भारतीय महासचिव रहे। वर्ष 1995 में वे पुनः कांग्रेस पार्टी में लौट आए।