वाशिंटगनः एक समय राष्ट्रपति बराक ओबामा पर कटाक्ष करते हुए सोशल मीडिया में डोनाल्ड ट्रम्प ने ट्वीट किया था कि सत्ता में बने रहने के लिए ओबामा ईरान में युद्ध छेड़ देंगे। आज वही ट्रम्प खुद ईरान में युद्ध शुरू कर सोशल मीडिया पर जबरदस्त ट्रोल हो रहे हैं। उनके एकतरफा फैसले से पश्चिम एशिया की शांति और स्थिरता आज खाई के किनारे मुहाने पर खड़ी है। ट्रम्प ने सोचा था कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व की हत्या कर वे तेजी से ‘रेजीम चेंज’ कर ‘मास्टरस्ट्रोक’ चल देंगे।
लेकिन गणना में उन्होंने भारी भूल कर दी। जमीनी हकीकत में वही ‘मास्टरस्ट्रोक’ अब भयानक ‘बूमरैंग’ बनकर अमेरिका और इज़राइल की ओर लौट रहा है। डेमोक्रेट पहले ही इसे ‘वॉर ऑफ चॉइस’ यानी ‘इच्छाकृत युद्ध’ बता चुके हैं। आरोप उठ रहे हैं कि एपस्टीन फाइल्स से ध्यान हटाने के लिए ही युद्ध छेड़ा गया।
संकुचित ट्रम्प को घेर कर आग उगलती ईरानी मिसाइलें। आसमान में खामेनेई का भुतहा चेहरा। पीछे काले कपड़ों में जुलूस, काले झंडे, जमकरान मस्जिद में लहरा रहा लाल प्रतिशोध का निशान।
पेंटागन रिपोर्ट लीक: ट्रम्प की फजीहत
इस हमले के पीछे ट्रम्प के दो मुख्य तर्क थे-पहला, प्रीएम्प्टिव स्ट्राइक (यानी ईरान पहले हमला कर सकता था) और दूसरा ईरान परमाणु खतरा पैदा कर रहा है। लेकिन अब दोनों दावे सवालों के घेरे में हैं।
1 मार्च को कैपिटल हिल में कांग्रेस की एक बंद कमरे की ब्रीफिंग में पेंटागन के शीर्ष अधिकारियों ने स्वीकार किया कि अमेरिका पर ईरान के आसन्न हमले का कोई ठोस खुफिया इनपुट उनके पास नहीं था। रॉयटर्स और CNN की रिपोर्ट के अनुसार डेमोक्रेट सीनेटर मार्क वॉर्नर ने भी यही बात कही।
दूसरी ओर 2 मार्च को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के महानिदेशक राफेल ग्रोसी ने स्पष्ट किया कि ईरान के परमाणु केंद्रों में किसी संगठित हथियार निर्माण का प्रमाण नहीं मिला है।
इससे हमले की वैधता पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। यदि ट्रम्प के दावे झूठे साबित होते हैं तो उन्हें देश और विदेश दोनों जगह गंभीर राजनीतिक और कानूनी संकट का सामना करना पड़ सकता है। अमेरिकी सैनिकों की मौत बढ़ने पर डेमोक्रेट महाभियोग का प्रस्ताव भी ला सकते हैं।
ज़ागरोस का जाल, दूसरा ‘अफगानिस्तान’?
ट्रम्प प्रशासन ने सोचा था कि बी-2 बॉम्बर और क्रूज़ मिसाइलों से हवाई हमले कर नेतृत्वविहीन ईरान में जनविद्रोह होगा और सरकार गिर जाएगी। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि केवल हवाई हमलों से सत्ता परिवर्तन संभव नहीं। इसके लिए जमीनी सेना उतारनी होगी।
ज़ागरोस पर्वतमाला की दुर्गम भौगोलिक स्थिति और ईरान की विकेंद्रीकृत ‘मोज़ेक डिफेंस’ रणनीति के कारण वहां जमीनी सैनिक भेजना ‘मदर ऑफ ऑल क्वैगमायर्स’ यानी भयानक दलदल साबित हो सकता है। सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार पूर्ण आक्रमण के लिए 1 लाख से 16 लाख सैनिकों की आवश्यकता पड़ सकती है। इससे अमेरिका एक और लंबे अफगानिस्तान या इराक जैसे युद्ध में फंस सकता है।
अरब दुनिया का ‘ना’, यूरोप भी दूर, अमेरिका अलग-थलग
अमेरिका को उम्मीद थी कि अरब देश उसका साथ देंगे। लेकिन सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर पहले ही साफ कर चुके हैं कि उनकी जमीन का उपयोग ईरान पर हमले के लिए नहीं होगा।
यूरोपीय सहयोगी फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन ने भी इस हमले में सीधे तौर पर हिस्सा नहीं लिया। उन्होंने एकतरफा कार्रवाई की आलोचना कर शांति वार्ता की अपील की है।
‘रैली अराउंड द फ्लैग’ और लाल झंडा
ट्रम्प की सबसे बड़ी उम्मीद ईरान की जनता थी, जो खामेनेई की नीतियों से असंतुष्ट थी। उन्हें लगा था कि हमले के बाद जनता सरकार के खिलाफ उठ खड़ी होगी।
लेकिन हुआ उल्टा। रमजान के पवित्र महीने में हमला, शिया धार्मिक नेता अली खामेनेई की हत्या और स्कूलों पर बमबारी इन सबने शिया भावनाओं और राष्ट्रवाद को उभार दिया। अब बड़ी संख्या में लोग सरकार के समर्थन में खड़े हो रहे हैं।
तेहरान से लेकर क़ोम तक काले कपड़ों और लाल झंडों के साथ प्रतिशोध के नारे गूंज रहे हैं। जमकरान मस्जिद में लाल झंडा लहरा रहा है, जो बदले का प्रतीक माना जाता है।
युद्धविराम?
सूत्रों के अनुसार ट्रम्प अब युद्धविराम का रास्ता तलाश रहे हैं, लेकिन ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अभी युद्धविराम के लिए तैयार नहीं। तेहरान का कहना है कि खामेनेई की हत्या के बाद अमेरिका और इज़राइल को उल्लेखनीय नुकसान पहुंचाने के बाद ही वे किसी विराम पर विचार करेंगे।
इस प्रकार, त्वरित सत्ता परिवर्तन के उद्देश्य से खेला गया दांव अब सैन्य, कूटनीतिक और भू-राजनीतिक स्तर पर अमेरिका के लिए बड़ी विफलता की ओर बढ़ता दिख रहा है। विश्लेषकों के अनुसार स्थिति अफगानिस्तान जैसी लंबी और थकाऊ जंग में बदल सकती है और जितना युद्ध लंबा चलेगा, ट्रम्प पर दबाव उतना ही बढ़ेगा।