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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक कदम: AI से बने फर्जी फैसलों को न्यायिक कदाचार माना जाएगा

भारत में AI बाजार बढ़ रहा, कानूनी क्षेत्र में तेजी से उपयोग, लेकिन निगरानी जरूरी।

By श्वेता सिंह

Mar 02, 2026 21:00 IST

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि AI यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बने फर्जी फैसलों पर आधारित आदेश अब न्यायिक कदाचार माने जाएंगे। ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सरकारी कामकाज में एआई का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। हालांकि बिना अनुमति के इसका दुरुपयोग चिंता का विषय बनता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एआई से बने काल्पनिक फैसलों पर निर्भरता न्याय प्रक्रिया की अखंडता को नुकसान पहुंचाती है। हाल के आंकड़ों के अनुसार भारत में एआई बाजार 2027 तक 1.45 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। कानूनी क्षेत्र में इसका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है।

सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अलोक अराधे की बेंच ने मामले की गहराई से जांच करने का फैसला किया है। कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरामणि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी किया है। वरिष्ठ वकील श्याम दीवान को मामले में सहायता के लिए नियुक्त किया गया है। कोर्ट ने 27 फरवरी के आदेश में कहा कि एआई से बने गैर-मौजूद फर्जी फैसलों पर आधारित निर्णय गलती नहीं, बल्कि कदाचार है और इसके कानूनी परिणाम होंगे। सुनवाई 10 मार्च को तय की गई है और ट्रायल कोर्ट को एडवोकेट कमिश्नर की रिपोर्ट पर आगे बढ़ने से रोका गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का कानूनी तकनीक बाजार 2026 तक 3.5 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, जो एआई के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।

मामला क्या है?

मामला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जनवरी आदेश से जुड़ा है। संपत्ति विवाद में ट्रायल कोर्ट ने संपत्ति की जांच के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया था। याचिकाकर्ताओं ने रिपोर्ट पर आपत्ति जताई, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने अगस्त 2025 के आदेश में कुछ फैसलों का हवाला दिया। बाद में पता चला कि ये फैसले एआई से बने फर्जी थे। हाईकोर्ट ने इसे चेतावनी देते हुए माना, लेकिन मेरिट पर केस खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले पर विस्तार से विचार कर रहा है। भारत में अदालतों में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें एआई जैसे उपकरण राहत पहुंचा सकते हैं, लेकिन दुरुपयोग को रोकना जरूरी है।

AI का न्यायिक प्रक्रिया में भी इस्तेमाल बढ़ा

एआई न्यायिक प्रक्रिया को तेज बनाने में मदद कर रहा है, लेकिन निगरानी अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट का SUVAS टूल 36,000 से ज्यादा फैसलों का हिंदी और अन्य भाषाओं में अनुवाद कर चुका है। ई-कोर्ट्स फेज III के तहत 7,210 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जिसमें एआई के लिए 53.57 करोड़ रुपये शामिल हैं। भारत में 6 लाख एआई पेशेवर हैं और 70 करोड़ इंटरनेट यूजर इसे बढ़ावा दे रहे हैं। इंडिया एआई मिशन के तहत 1.2 अरब डॉलर का निवेश हो रहा है।

यह फैसला अहम क्यों है?

हालांकि, 17 फरवरी को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने एआई से बने फर्जी फैसलों, जैसे मर्सी बनाम मैनकाइंड, पर चिंता जताई। विशेषज्ञों का कहना है कि एआई कुशल उपकरण है, लेकिन सख्त निगरानी जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम न्यायिक अखंडता बनाए रखने, एआई के दुरुपयोग को रोकने और डिजिटल इंडिया के बढ़ते उपयोग के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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