नयी दिल्ली/जोधपुरः जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को शनिवार को जोधपुर सेंट्रल जेल से रिहा कर दिया गया। यह रिहाई तब हुई जब केंद्र सरकार ने उनकी हिरासत को तुरंत प्रभाव से खत्म करने का फैसला किया। रतनाडा पुलिस स्टेशन के एसएचओ दिनेश लाखावत के अनुसार, केंद्र सरकार के आदेश के बाद वांगचुक को शनिवार दोपहर लगभग 1:30 बजे जेल से रिहा किया गया। रिहाई की औपचारिकताएं पूरी करने के लिए उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो भी जोधपुर पहुंची थीं।
केंद्र सरकार ने जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की हिरासत को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत तुरंत प्रभाव से समाप्त करने का फैसला किया है। उन्हें 26 सितंबर 2025 को लेह में कानून-व्यवस्था बिगड़ने की घटना के बाद NSA के तहत हिरासत में लिया गया था। यह कार्रवाई सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए लेह के जिला मजिस्ट्रेट के आदेश पर की गई थी। वांगचुक लगभग आधी निर्धारित हिरासत अवधि जेल में बिता चुके थे।
कब और क्यों गिरफ्तार किए गए थे
पिछले साल 26 सितंबर 2025 को लद्दाख में “अशांति फैलाने में मदद करने” के आरोप में सोनम वांगचुक को हिरासत में लिया गया था। तब से वे जेल में बंद थे। उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जोधपुर जेल में रखा गया था। अब जल्द ही उन्हें रिहा कर दिया जाएगा। उनकी गिरफ्तारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी मामला दायर किया गया था। मामला अभी अदालत में चल ही रहा था कि केंद्र सरकार ने अपना फैसला बदलते हुए उनकी रिहाई का निर्णय लिया।
गृह मंत्रालय का बयान
गृह मंत्रालय के बयान के अनुसार कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिया गया था। वे इस कानून के तहत लगभग छह महीने जेल में रह चुके हैं। सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद ही उन्हें रिहा करने का फैसला लिया गया है।
सरकार का उद्देश्य
गृह मंत्रालय ने कहा कि केंद्र सरकार लद्दाख में शांति, स्थिरता और आपसी विश्वास का माहौल बनाए रखना चाहती है। इसके लिए सभी पक्षों के साथ रचनात्मक बातचीत संभव हो सके, इसी उद्देश्य से सोनम वांगचुक की हिरासत का आदेश वापस लिया गया है। सरकार ने यह भी कहा कि लद्दाख के विकास के लिए वह क्षेत्र के सभी समुदायों और समूहों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखेगी।
NSA कानून क्या है
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अनुसार अगर सरकार को लगे कि कोई व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा या कानून-व्यवस्था के लिए संभावित खतरा है, तो उसे बिना मुकदमे के अधिकतम 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है। हालांकि सरकार चाहे तो इस आदेश को पहले भी वापस ले सकती है, जैसा कि इस मामले में किया गया है।
सितंबर 2025 में क्या हुआ था
सितंबर 2025 में लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा देने की मांग को लेकर बड़ा आंदोलन शुरू हुआ था। इस आंदोलन के दौरान लेह में प्रदर्शन हिंसक हो गया। झड़पों में कम से कम चार लोगों की मौत हुई और कई लोग घायल हुए। इसके दो दिन बाद, 26 सितंबर 2025 को पुलिस ने सोनम वांगचुक को NSA के तहत गिरफ्तार कर लिया।
केंद्र के आरोप
केंद्र सरकार का आरोप था कि सोनम वांगचुक के बयान और आंदोलन ने लद्दाख में विरोध को भड़काया, जिससे स्थिति हिंसक हो गई। यह भी कहा गया कि वे लद्दाख को नेपाल या बांग्लादेश जैसी स्थिति की ओर ले जाना चाहते थे। हालांकि वांगचुक ने इन आरोपों को साफ तौर पर नकार दिया और कहा कि वे हमेशा शांतिपूर्ण आंदोलन के पक्ष में रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई
सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो ने सुप्रीम कोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की थी। इसमें कहा गया था कि NSA के तहत वांगचुक की गिरफ्तारी गैरकानूनी है और उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। यह मामला लंबे समय से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन था। सुनवाई के दौरान अदालत ने वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति को लेकर भी चिंता जताई और सरकार को मामले पर फिर से विचार करने की सलाह दी थी।
त्सरिंग लागरोक ने कहा-यह पूरे ललद्दाख की जीत
लद्दाख एपेक्स बॉडी के सह-अध्यक्ष और लद्दाख बौद्ध एसोसिएशन के अध्यक्ष त्सरिंग लागरोक ने वांगचुक की रिहाई को पूरे लद्दाख की जीत बताया। उन्होंने कहा कि उन पर लगाया गया “एंटी-नेशनल” का आरोप अदालत में साबित नहीं हो पाया। लागरोक के अनुसार सरकार सुप्रीम कोर्ट में आरोप साबित नहीं कर सकी और मामला हारने की स्थिति में थी, इसलिए उसने इसे पहले ही समाप्त कर दिया। लागरोक ने यह भी कहा कि लेह हिंसा से जुड़े मामले में असली न्याय तब मिलेगा जब न्यायिक जांच का अंतिम फैसला आएगा। उनके अनुसार घटना में जिन लोगों की मौत हुई या जो घायल हुए, वे गोलीबारी के कारण हुए थे। अगर जांच आयोग यह नहीं बता पाता कि गोली किसने चलाई और किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता, तो पीड़ितों को न्याय मिलना मुश्किल होगा।
रिहाई पर प्रतिक्रियाएं
अरविंद केजरीवालः आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने वांगचुक की रिहाई के बाद केंद्र सरकार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार एक बार फिर “बेनकाब” हो गई है। एक वैज्ञानिक और जलवायु कार्यकर्ता को बिना किसी ठोस सबूत के गिरफ्तार किया गया। उन्होंने कहा कि वांगचुक के कई महीनों तक जेल में रहने से केवल उनका व्यक्तिगत नुकसान नहीं हुआ, बल्कि यह देश के लिए भी नुकसान है। केजरीवाल ने इस कार्रवाई को “खुली तानाशाही” बताते हुए कहा कि ऐसी घटनाओं की आलोचना होनी चाहिए और उन्हें तुरंत रोका जाना चाहिए।
शशि थरूरः कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने वांगचुक की रिहाई का स्वागत किया, लेकिन बिना मुकदमे के लंबी हिरासत पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को 169 दिनों तक बिना मुकदमे के हिरासत में रखना बहुत लंबा समय है। थरूर ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि वह ऐसा स्पष्ट नियम बनाए, जिसमें बिना मुकदमे के हिरासत की अधिकतम समय सीमा तय हो। अनिश्चित समय तक बिना मुकदमे के हिरासत में रखना औपनिवेशिक दौर की अलोकतांत्रिक व्यवस्था है और एक परिपक्व लोकतंत्र में इसका कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
महबूबा मुफ्तीः पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने भी वांगचुक की रिहाई पर कहा कि सोनम वांगचुक पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाना सही नहीं था। वांगचुक ने पर्यावरण संरक्षण के लिए बहुत काम किया है ऐसे व्यक्ति को NSA जैसे कठोर कानून के तहत गिरफ्तार करना उचित नहीं था।