नई दिल्ली : शहरी जीवन की तेज रफ्तार, बढ़ता तनाव और अकेलापन बड़े शहरों में आत्महत्या की प्रवृत्ति को और बढ़ा रहे हैं। वर्तमान समय में आत्महत्याओं के पीछे सबसे बड़ा कारण परिवारिक अशांति बन गया है। शहर आधारित आंकड़ों के अनुसार देश की राजधानी दिल्ली इस मामले में शीर्ष पर है।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा हाल ही में जारी की गई एक्सिडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया 2024 रिपोर्ट देश में मानसिक स्वास्थ्य की चिंताजनक स्थिति को उजागर करती है। रिपोर्ट के अनुसार कुछ लोग पारिवारिक समस्याओं, रिश्तों के तनाव और स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों के कारण आत्महत्या का रास्ता अपनाते हैं, वहीं शहरों में बढ़ती जीवनशैली की चुनौतियाँ और अकेलापन भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कोलकाता और पश्चिम बंगाल के अन्य शहरों में भी इस प्रवृत्ति का असर देखा जा रहा है।
एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2024 में पूरे भारत में कुल 1,70,746 लोग आत्महत्या कर चुके हैं। इनमें से 33.5 प्रतिशत मामलों में कारण परिवारिक समस्या रहा। यानी हर तीन आत्महत्याओं में कम से कम एक के पीछे परिवारिक दबाव, रिश्तों में तनाव या घरेलू अशांति है। दूसरा सबसे बड़ा कारण अस्वस्थता है, जिससे 17.9 प्रतिशत आत्महत्याएं हुई हैं। इसके अलावा प्रेम संबंधी मुद्दे, विवाह से जुड़ी समस्याएं, कर्ज, बेरोजगारी, परीक्षा में असफलता, मादक पदार्थों की लत और संपत्ति विवाद भी आत्महत्या के महत्वपूर्ण कारणों में शामिल हैं।
मनोचिकित्सक और मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यह प्रवृत्ति केवल आंकड़ों का प्रतिबिंब नहीं है बल्कि सामाजिक परिवर्तनों का भी संकेत देती है। खासकर शहरों और उनके उपनगरों में पारिवारिक संरचना तेजी से बदल रही है। संयुक्त परिवार की जगह छोटे परिवार, लंबा कार्यकाल, वित्तीय दबाव और सामाजिक अलगाव लोगों की मानसिक स्थिति को प्रभावित कर रहे हैं। कोलकाता और पश्चिम बंगाल के अन्य शहर और ग्रामीण क्षेत्र भी इस प्रवृत्ति से अछूते नहीं हैं। विशेषज्ञों के अनुसार मध्यवर्गीय परिवारों में आर्थिक अनिश्चितता और रिश्तों का टूटना मानसिक अवसाद का बड़ा कारण बन रहा है।
शहर आधारित आंकड़ों में आत्महत्याओं की संख्या के मामले में दिल्ली शीर्ष पर है। 2024 में राजधानी में 2,905 लोगों ने आत्महत्या की। हालांकि 2023 की तुलना में यह संख्या लगभग 7 प्रतिशत कम हुई है लेकिन देश के 53 बड़े शहरों में दिल्ली की स्थिति सबसे अधिक चिंता वाली है। दूसरे स्थान पर बेंगलुरु है जहां आत्महत्याओं की संख्या 2,403 रही। तीसरे स्थान पर मुंबई है, जहां 1,403 आत्महत्याएं दर्ज की गई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार महानगरों में कार्यस्थल का दबाव, ट्रैफिक जाम, उच्च जीवन स्तर और सामाजिक अलगाव मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल रहे हैं।
आत्महत्याओं की संख्या के मामले में कोलकाता शीर्ष पर नहीं है, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार चिंता का स्तर बढ़ रहा है। उनका कहना है कि पूर्वी भारत के अन्य शहरों की तुलना में कोलकाता में सामाजिक और पारिवारिक संबंध अभी भी मजबूत हैं, लेकिन तेजी से बदलती जीवनशैली, डिजिटल निर्भरता और रोजगार का दबाव युवा पीढ़ी को मानसिक रूप से प्रभावित कर रहा है। खासकर कॉलेज छात्र और कार्यजीवन की शुरुआत में युवाओं में चिंता और अवसाद की प्रवृत्ति बढ़ रही है। परिणामस्वरूप, जेन-जेड और जेन-वाई पीढ़ियां गंभीर मानसिक दबाव में हैं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि आत्महत्याओं की प्रवृत्ति सबसे अधिक 18 से 30 वर्ष के आयु समूह में है, इसके बाद 30 से 45 वर्ष के लोग आते हैं। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि प्रतिस्पर्धात्मक शिक्षा प्रणाली, नौकरी की अनिश्चितता, सामाजिक–आर्थिक स्थिति की तुलना और सोशल मीडिया आधारित जीवनशैली युवा वर्ग में मानसिक दबाव बढ़ा रहे हैं। कई मामलों में लोग अपनी समस्याओं को परिवार या मित्रों के साथ साझा नहीं कर पाते।
एनसीआरबी के अनुसार देश में प्रति लाख जनसंख्या आत्महत्या की औसत दर 12.2 है जबकि शहरी क्षेत्रों में यह बढ़कर 16.3 हो जाती है। आत्मघात करने वालों में लगभग 73.5 प्रतिशत पुरुष और 26.5 प्रतिशत महिलाएं हैं। अधिकतर आत्मघाती व्यक्ति विवाहित हैं। विशेषज्ञों के अनुसार पुरुष मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं पर खुलकर बात करने में हिचकिचाते है और सामाजिक दबाव स्थिति को और जटिल बना देता है। इसलिए विशेषज्ञ जोर दे रहे हैं कि काउंसलिंग सेवाओं का विस्तार, स्कूल और कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता और पारिवारिक स्तर पर जागरूकता बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है।