घर में नया खिलौना आते ही बच्चों की आंखों-चेहरे पर जो खुशी झलकती है, वह देखने लायक होती है। लेकिन वही खिलौना अगर किसी और के हाथ में चला जाए तो रोना या गुस्सा शुरू हो जाता है। शुरुआत में इस बात को ज्यादा महत्व न दिया जाए, तो बड़े होने के साथ-साथ कई तरह की समस्याएं सामने आने लगती हैं। अगर बचपन से ही बच्चों को अपनी चीजें बांटने की सीख दी जाए, तो वे बड़े होकर ज्यादा सहानुभूतिशील और सामाजिक बनते हैं।
क्यों जरूरी है शेयरिंग सिखाना?
शेयरिंग का मतलब सिर्फ खिलौना बांटना नहीं है। इसमें सहानुभूति, दोस्ती, धैर्य और सम्मान की भावना भी शामिल है। जब कोई बच्चा अपनी पसंदीदा चॉकलेट का आधा हिस्सा दोस्त को देता है, तो वह सिर्फ खाना ही नहीं प्यार भी बांटता है। यही छोटी-छोटी आदतें आगे चलकर उसके चरित्र निर्माण में बड़ी भूमिका निभाती हैं।
कब से शुरू करें?
दो से तीन साल की उम्र से ही बच्चे को सरल तरीके से ‘बांटकर लेना’ सिखाया जा सकता है। हालांकि, इस उम्र में बच्चे स्वभाव से अपनी चीजें अपने पास रखना चाहते हैं। इसलिए जोर-जबरदस्ती नहीं, बल्कि धीरे-धीरे सिखाना चाहिए। कहानी, खेल और रोजमर्रा की जिंदगी के उदाहरण देकर समझाने पर वे आसानी से सीख जाते हैं।
बच्चे बड़ों को देखकर ही सीखते हैं। अगर आप घर में खाना या अन्य चीजें सहजता से बांटते हैं, तो वही उनके लिए स्वाभाविक बन जाएगा। दोस्तों के साथ खेलने जाते समय भी उन्हें खिलौनों का आदान-प्रदान करना सिखाएं। इससे वे समझेंगे कि बांटने का आनंद ही अलग होता है।
अगर कभी बच्चा अपना पसंदीदा खिलौना देने से मना करे, तो गुस्सा करने के बजाय समय लेकर उससे बात करें। इससे उसके मन पर दबाव नहीं पड़ेगा और शेयरिंग का अवसर भी बना रहेगा। जब भी आपका बच्चा कुछ बांटे, उसकी सराहना करें। यही प्रशंसा उसे अगली बार और उत्साहित करेगी।
परी कथाओं या छोटी कहानियों में शेयरिंग के उदाहरण दें। अगर कहानी के पात्र बांटकर खुशी पाते हैं, तो बच्चे भी उसी व्यवहार की नकल करना चाहेंगे।
अक्सर हम कहते हैं कि अगर तुम नहीं बांटोगे तो कोई तुम्हारे साथ नहीं खेलेगा।” इस तरह की बातें बच्चे के मन में डर पैदा कर सकती हैं। शेयरिंग खुशी का विषय हो, मजबूरी नहीं। हर समय बच्चे को अपनी पसंदीदा चीज देने के लिए मजबूर करना भी सही नहीं है। इससे उसमें झुंझलाहट पैदा हो सकती है। यह भी सिखाना जरूरी है कि अपनी चीजों पर उसका अधिकार है। वह चाहे तो कुछ चीजें निजी रख सकता है। लेकिन दूसरों के साथ खुशी बांटने से रिश्ते और मजबूत होते हैं—यही मुख्य संदेश है।
आज जो बच्चा खिलौने बांटना सीख रहा है, कल वह समय, ध्यान और प्यार भी बांटना सीखेगा। कार्यस्थल, दोस्ती या परिवार—हर जगह यह आदत उसे आगे रखेगी। इसलिए बचपन से ही शेयरिंग की आदत विकसित करें।
—आरात्रिका दे