पुणे में किए गए एक शोध ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा है, जिसमें ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में आयुर्वेद रसायन थेरेपी (एआरटी) की भूमिका का मूल्यांकन किया गया है। यह शोध 5 से 7 दिसंबर के बीच आयोजित ईएसएमओ एशिया कांग्रेस 2025 में प्रस्तुत किया गया, जो दुनिया के प्रमुख कैंसर सम्मेलनों में से एक है। रसायु कैंसर क्लिनिक द्वारा किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि यदि आयुर्वेद रसायन थेरेपी को आधुनिक एलोपैथिक इलाज के साथ सहायक रूप में अपनाया जाए तो ब्रेस्ट कैंसर मरीजों की जीवन गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है, खासकर उन मरीजों में जो बीमारी या इलाज से जुड़ी शारीरिक और मानसिक परेशानियों से जूझ रहे हैं।
पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के अनुसार, भारत में महिलाओं में होने वाले कुल कैंसर मामलों में से 28.2 प्रतिशत ब्रेस्ट कैंसर के हैं। हालांकि चिकित्सा विज्ञान में प्रगति के कारण जीवित रहने की दर बढ़ी है लेकिन कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी और सर्जरी जैसे इलाजों के बाद मरीजों को थकान, चिंता, अवसाद, नींद की समस्या और बीमारी के बढ़ने या दोबारा होने का डर जैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसी वजह से कई महिलाएं इलाज से जुड़ी परेशानियों को कम करने के लिए आयुर्वेद जैसे पूरक उपचारों की ओर रुख कर रही हैं।
रसायु टीम ने 2021 से 2023 के बीच आयुर्वेदिक इलाज लेने वाले 254 ब्रेस्ट कैंसर मरीजों के रिकॉर्ड का विश्लेषण किया। इनमें कुछ मरीजों ने एलोपैथिक इलाज पूरा करने के बाद बीमारी की वापसी रोकने के उद्देश्य से आयुर्वेद अपनाया, कुछ ने बीमारी की गति धीमी करने के लिए, जबकि अधिकांश मरीजों ने अपनी जीवन गुणवत्ता बेहतर करने के लिए आयुर्वेद रसायन थेरेपी ली। अध्ययन में यह सामने आया कि जिन मरीजों ने एलोपैथिक इलाज के साथ आयुर्वेद को सहायक रूप में अपनाया, उनमें इलाज के बाद की थकान, चिंता, अनिद्रा और बीमारी बढ़ने के डर जैसे लक्षणों में सुधार देखा गया।
विशेष रूप से स्टेज-4 ब्रेस्ट कैंसर के जिन मरीजों ने कम से कम 90 दिनों तक आयुर्वेद रसायन थेरेपी ली, उनमें चिंता और अवसाद में कमी, नींद की गुणवत्ता में सुधार, लक्षणों पर बेहतर नियंत्रण और कुल मिलाकर जीवन गुणवत्ता में स्पष्ट सुधार दर्ज किया गया। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन भारत में आयुर्वेदिक ऑन्कोलॉजी से जुड़े सबसे बड़े वास्तविक जीवन आधारित अध्ययनों में से एक है, जो इस क्षेत्र में मौजूद साक्ष्यों की कमी को भी पूरा करता है।
इस शोध को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल Annals of Oncology में प्रकाशित किया जाना प्रस्तावित है, जिसका इंपैक्ट फैक्टर 65.4 है, जिससे इस अध्ययन की विश्वसनीयता और बढ़ जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह शोध एलोपैथिक ऑन्कोलॉजिस्ट और आयुर्वेदिक चिकित्सकों के बीच सहयोग को बढ़ावा देगा और इंटीग्रेटिव ऑन्कोलॉजी को व्यापक रूप से अपनाने की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकता है।
रसायु कैंसर क्लिनिक, पुणे के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. योगेश बेंदाले ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कैंसर मंचों पर अब मरीजों द्वारा बताए गए अनुभवों और जीवन गुणवत्ता को विशेष महत्व दिया जा रहा है। उनके अनुसार, यह अध्ययन दर्शाता है कि आयुर्वेद रसायन थेरेपी कैंसर मरीजों की कई अधूरी चिकित्सकीय जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि ऑन्कोलॉजिस्ट और आयुर्वेदिक डॉक्टरों के बीच निष्पक्ष संवाद और सहयोग कैंसर मरीजों के हित में बेहद जरूरी है, ताकि आयुर्वेद को प्रभावी तरीके से इलाज में शामिल किया जा सके और इसे वैश्विक स्तर पर मरीजों के लिए सुलभ बनाया जा सके।