दावोस/ढाकाः बांग्लादेश में अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार मुहम्मद यूनुस के कार्यकाल के दौरान अल्पसंख्यक समुदाय पर हुए हमलों को लेकर सरकार ने एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2025 में देश में अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ कुल 645 हिंसक घटनाएं दर्ज की गई। सरकार का कहना है कि इनमें से केवल 71 मामलों को ही ‘सांप्रदायिक’ प्रकृति का माना गया है, जबकि शेष 574 घटनाएं ‘गैर-सांप्रदायिक’ थीं।
यह रिपोर्ट कैसे तैयार की गयी है?
यह जानकारी मुहम्मद यूनुस के प्रेस सचिव शफीकुल आलम ने सोमवार को दी। उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट प्राथमिकी, सामान्य डायरी, आरोप पत्र और जांच से जुड़े आधिकारिक अपडेट्स के आधार पर तैयार की गई है।
पिछले कुछ महीनों में बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय पर हमलों की कई घटनाएं सामने आई हैं। दीपू चंद्र दास की हत्या, गाजीपुर में फैक्ट्री मालिक लिटन घोष की मौत, अमृत मंडल और रिपन साहा की हत्या जैसी घटनाओं ने देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इन मामलों में आरोप लगते रहे हैं कि पीड़ितों को उनकी धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाया गया।
हमले के पीछे की वजह क्या है?
हालांकि, बांग्लादेश सरकार का कहना है कि अधिकतर मामलों में सांप्रदायिक मंशा नहीं पाई गई। प्रेस विंग के अनुसार, 645 में से 71 मामलों को ही सांप्रदायिक घटनाओं की श्रेणी में रखा गया है। इन 71 मामलों में 38 घटनाएं मंदिरों में तोड़फोड़ से जुड़ी थीं, 8 मामलों में आगजनी हुई, 1 मामला मंदिर में चोरी का था, 1 मामला हत्या का दर्ज किया गया और 23 मामलों में मूर्तियां तोड़ने की धमकी या सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक और धमकी भरे पोस्ट सामने आए।
सरकार के मुताबिक इन 71 मामलों में से 50 मामलों में केस दर्ज किए गए हैं और 50 लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है।
वहीं, बाकी 574 घटनाओं को सरकार ने ‘गैर-सांप्रदायिक’ करार दिया है। इनमें अप्राकृतिक मौतें, चोरी, बलात्कार और अन्य गंभीर आपराधिक मामले शामिल हैं। प्रशासन का कहना है कि इन मामलों में हमले का कारण जमीन विवाद, निजी दुश्मनी या सामान्य आपराधिक गतिविधियां थीं, न कि पीड़ितों की धार्मिक पहचान।
बांग्लादेशी प्रशासन का यह भी दावा है कि जांच में इन 574 मामलों में किसी भी घटना में अल्पसंख्यक होने के कारण हमला किए जाने का प्रमाण नहीं मिला है।
हालांकि, अल्पसंख्यक समुदाय और मानवाधिकार संगठनों की ओर से इन दावों पर सवाल उठाए जाते रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सांप्रदायिक और गैर-सांप्रदायिक घटनाओं के वर्गीकरण को लेकर पारदर्शिता और स्वतंत्र जांच बेहद जरूरी है ताकि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर विश्वास बहाल किया जा सके।