बीजिंगः चीन में घटती जनसंख्या केवल आँकड़ों का सवाल नहीं है, बल्कि यह उस दीर्घकालिक नीति, सामाजिक ढांचे और आर्थिक दबावों का परिणाम है, जिसे बदलना सरकार के लिए आज सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। जिस देश ने दशकों तक “कम बच्चे, बेहतर जीवन” को राष्ट्रीय लक्ष्य बनाया, वही देश अब अपने नागरिकों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए मनाने की कोशिश कर रहा है। 2025 के ताज़ा सरकारी आँकड़े इस संकट की गहराई को उजागर करते हैं। चीन की आबादी घटकर 1.404 अरब रह गई है और यह लगातार चौथा साल है जब जनसंख्या में कमी दर्ज हुई है। यह गिरावट प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि संरचनात्मक मानी जा रही है। ऐसी गिरावट जिसे केवल नीति बदलकर तुरंत पलटना संभव नहीं।
एक नीति, कई पीढ़ियों पर असर
एक-बच्चा नीति केवल परिवारों की संख्या नियंत्रित करने का साधन नहीं थी, बल्कि उसने सामाजिक व्यवहार को स्थायी रूप से ढाल दिया। छोटे परिवार सामान्य हो गए, करियर को प्राथमिकता मिली और बच्चों को “महँगा निवेश” समझने की प्रवृत्ति विकसित हुई। इस सोच ने अगली पीढ़ी को भी प्रभावित किया, जो अब माता-पिता बनने से पहले आर्थिक स्थिरता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अधिक महत्व देती है। जब 2015 में दो बच्चों और 2021 में तीन बच्चों की अनुमति दी गई, तब तक सामाजिक मानसिकता काफी हद तक बदल चुकी थी। नतीजा यह हुआ कि नीति में ढील के बावजूद जन्म दर में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो सकी।
आर्थिक दबाव और प्रतिस्पर्धी समाज
जनसंख्या संकट के पीछे आर्थिक कारण भी उतने ही अहम हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और देखभाल की बढ़ती लागत ने बच्चे के पालन-पोषण को अत्यधिक महँगा बना दिया है। शहरी चीन में प्रतिस्पर्धा इतनी तीव्र है कि माता-पिता पर “सर्वश्रेष्ठ भविष्य” देने का दबाव बना रहता है। हालिया आर्थिक सुस्ती और रोजगार को लेकर अनिश्चितता ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है। यही कारण है कि 2025 में जन्मे बच्चों की संख्या घटकर मात्र 79.2 लाख रह गई। एक साल में 17 प्रतिशत की गिरावट। प्रति 1,000 लोगों पर 5.63 जन्म की दर अब तक की सबसे निचली दर है।
सरकार के उपाय: प्रोत्साहन और सामाजिक हस्तक्षेप
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए चीनी सरकार ने कई स्तरों पर हस्तक्षेप किए हैं। नकद सब्सिडी, कर छूट और बाल-देखभाल सेवाओं को बढ़ावा देने जैसे कदम उठाए गए हैं। प्रति बच्चे 3,600 युआन की सब्सिडी का उद्देश्य आर्थिक बोझ को कुछ हद तक कम करना है। इसके साथ ही सरकार ने व्यवहार बदलने की कोशिश भी की है। गर्भनिरोधकों पर कर लगाना और किंडरगार्टन व डे-केयर सेवाओं को कर-छूट देना इसी रणनीति का हिस्सा है। यहाँ तक कि वैवाहिक मेल-मिलाप सेवाओं को भी प्रोत्साहन के दायरे में लाया गया है, ताकि शादी और परिवार निर्माण को सामाजिक रूप से बढ़ावा दिया जा सके।
क्यों मुश्किल है राह?
विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल नीतिगत नहीं, बल्कि विश्वास और भविष्य की सुरक्षा से जुड़ी है। जब तक युवाओं को यह भरोसा नहीं होगा कि बच्चे पैदा करने से उनकी आर्थिक और व्यक्तिगत ज़िंदगी अस्थिर नहीं होगी, तब तक प्रोत्साहन सीमित असर ही दिखाएंगे। चीन का जनसंख्या संकट अब एक दीर्घकालिक चुनौती बन चुका है, जहाँ घटती जन्म दर, बूढ़ी होती आबादी और श्रमबल में संभावित कमी आर्थिक विकास पर सीधा असर डाल सकती है। ऐसे में सवाल यह नहीं रह गया है कि चीन अधिक बच्चे कैसे पैदा कराए, बल्कि यह है कि वह समाज की उस सोच को कैसे बदले, जिसे उसने खुद दशकों में गढ़ा था।