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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, चुनाव आयोग को जारी करनी होगी लॉजिकल गड़बड़ियों की सूची

CJI ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति के पिता का नाम गलत है तो उस नाम को ठीक करने में कोई दिक्कत नहीं है।

By Arindam Bandyopadhyay, Posted By : Moumita Bhattacharya

Jan 19, 2026 17:15 IST

सुप्रीम कोर्ट ने SIR को लेकर बड़ा आदेश जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि चुनाव आयोग को लॉजिकल गड़बड़ियों की सूची जारी करनी होगी। पश्चिम बंगाल में चल रहे SIR को लेकर तृणमूल सांसद डेरेक ओ'ब्रायन और दोला सेन द्वारा दायर किए गए मामले की सुनवाई के दौरान यह फैसला लिया गया। इसके साथ ही कई और अहम आदेश भी दिए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि माध्यमिक के एडमिट कार्ड को SIR की सुनवाई में दस्तावेज के तौर पर स्वीकार किया जाए। वहीं एक जनप्रतिनिधि (वह BLA भी हो सकता है) को भी सुनवाई के दौरान वहां रखा जा सकता है। मामले की अगली सुनवाई 6 हफ्ते बाद फिर से होगी।

पिछले कुछ दिनों से जब से SIR की सुनवाई की प्रक्रिया शुरू हुई है तीन बातों की चर्चाएं सबसे ज्यादा हो रही हैं। एक - लॉजिकल गड़बड़ी जिसकी वजह से लाखों लोगों को सुनवाई का नोटिस भेजा जा रहा है। कुछ लोगों को तो एक नहीं बल्कि तीन बार बुलाया जा रहा है। दो - सुनवाई के दौरान BLA या BLA-2 का उपस्थित होना। तीन - पिछले कुछ दिनों से माध्यमिक के एडमिट कार्ड की स्वीकार्यता पर सवाल उठया जा रहा है। इस बात का भी इस मामले में जिक्र किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एडमिट कार्ड को एक दस्तावेज के तौर पर स्वीकार किया जाए।

चुनाव आयोग को लॉजिकल गड़बड़ियों वाली लिस्ट में 1 करोड़ 36 लाख लोगों के नाम जारी करने होंगे। नामों की यह लिस्ट सभी ब्लॉक, पंचायत, जिला मुख्यालय में रखनी होगी। लिस्ट जारी होने के 10 दिन के अंदर सुनवाई करने का भी आदेश दिया गया है। सोमवार को वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट में अपनी दलील में कहा, '1 करोड़ 32 लाख लॉजिकल गड़बड़ी है।

यह राज्य की कुल आबादी का लगभग 20 प्रतिशत है। हर दिन 40 हजार सुनवाई हो रही है। सिर्फ 20 दिन बचे हैं। SIR सुनवाई कैसे पूरी होगी?' वहीं सवाल-जवाब के दौरान कोर्ट में BLA को सुनवाई में मौजूद न होने देने का मुद्दा भी उठाया गया।

सिब्बल ने सवाल उठाया कि लॉजिकल गड़बड़ियां आखिर क्या है? नाम की स्पेलिंग गलत होना, दादा और पोते की उम्र में अंतर, लॉजिकल अंतर। भले ही नाम 2002 की लिस्ट में है फिर भी लॉजिकल अंतर बताया गया है। चुनाव आयोग को बूथ स्तर पर लॉजिकल अंतरों की सूची जारी करने दें। हमें कोई आपत्ति नहीं होगी। अगर गांगुली की स्पेलिंग गलत है तो इसे लॉजिकल अंतर कहा जा रहा है। यह वैध वोटरों के नाम लिस्ट से हटाने के लिए किया जा रहा है।

हालांकि चुनाव आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि यह आरोप सच नहीं है। अगर मां-बाप और बच्चों की उम्र में 15 साल से कम का अंतर है तो यह एक लॉजिकल अंतर है।

कोर्ट ने जानना चाहा, ‘यह कैसे हो सकता है? हमारे देश में बाल विवाह नहीं होता। आपने खुद कहा कि यह सबको साथ लेकर चलने की प्रक्रिया है। आपने खुद कहा कि सभी राजनैतिक पार्टियां इसमें बराबरी से हिस्सा लेंगी। तो अगर उनके प्रतिनिधि या BLA ही SIR की सुनवाई के दौरान मौजूद रहेंगे तो इसमें क्या दिक्कत है?’

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने कहा, ‘अगर एक BLA आ जाए तो क्या दिक्कत है? एक BLA मेरा प्रतिनिधि हो सकता है।’ इसका जवाब देते हुए चुनाव आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने कहा, ‘हमने कहा है कि मदद के लिए एक प्रतिनिधि रह सकता है।’ यह सुनकर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘एक वैध वोटर प्रतिनिधि को नियुक्त कर सकता है, वह BLA हो सकता है।’ साथ ही, उन्होंने जानना चाहा कि जिन लोगों के नाम लॉजिकल गड़बड़ियों की सूची में रखे गए हैं, उनके नाम जारी क्यों नहीं किए जा रहे हैं?

कपिल सिब्बल ने भी मैप्ड-अनमैप्ड सूची जारी करने के पक्ष में बात की। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हमें इस बात से कोई दिक्कत नहीं है कि कोई वैध मतदाता प्रतिनिधि राजनैतिक व्यक्ति है या नहीं।’ राकेश द्विवेदी ने कहा कि वे सुनवाई के दौरान कोई अशांति नहीं चाहते हैं।

अदालत में फॉर्म नंबर 7 का मामला भी उठा। वकील कल्याण बनर्जी ने कहा कि दो कारों से 3,000 फॉर्म बरामद किए गए हैं। FIR दर्ज की गई है। यह फॉर्म सिर्फ वोटर ही जमा कर सकते हैं। मुख्य न्यायाधीश ने साफ किया कि मुख्य लक्ष्य संवैधानिक प्रक्रिया को निष्पक्ष तरीके से पूरा करना है। वकील श्याम दीवान की दलील पर अदालत ने कहा कि संदेश के लिए ह्वाट्स ऐप नहीं सर्कुलर जारी करना होगा।

मुख्य न्यायाधीश ने आज लॉजिकल गड़बड़ी पर एक और अहम बात कही। उन्होंने कहा कि अगर किसी व्यक्ति के पिता का नाम गलत है तो उस नाम को ठीक करने में कोई दिक्कत नहीं है। दिक्कत तब होगी जब पिता का नाम गलत रहने पर किसी वैध मतदाता का नाम ही सूची से बाहर कर दिया जाएगा। अदालत ने साफ किया कि मतदाताओं को परेशान करना ठीक नहीं है। आम लोगों के दर्द और चिंता को समझा जाना चाहिए। कोई तीसरा मुद्दा नहीं बनाया जा सकता।

साथ ही अदालत ने कहा कि राज्य सरकार और केंद्र सरकार को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का निर्देश दिया जा रहा है। राज्य सरकार और चुनाव आयोग को पर्याप्त संख्या में सहायता कर्मचारी का इंतजाम करना होगा। राज्य पुलिस के DGP को कानून-व्यवस्था बनाए रखनी होगी। अगर चुनाव आयोग किसी व्यक्ति के दस्तावेज की जांच के बाद संतुष्ट नहीं होता है तो वह संबंधित व्यक्ति को बताएगा कि सुनवाई कब और कहां होगी। दस्तावेज जमा करने के बाद आयोग को उसकी रसीद देनी होगी।

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