🔔 ताज़ा ख़बरें सबसे पहले!

Samachar EiSamay की ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, खेल, मनोरंजन और बिज़नेस अपडेट अब सीधे आपके पास।

सऊदी का पेट्रो-डॉलर, पाकिस्तान का परमाणु हथियार और तुर्की के ड्रोन, क्या इस्लामिक NATO तैयार हो रहा?

तीन-तरफा गठबंधन भारत के साथ-साथ ईरान और पश्चिमी ताकतों के लिए चुनौती पैदा कर सकता है।

By अमर्त्य लाहिड़ी, Posted by: श्वेता सिंह

Jan 14, 2026 21:49 IST

नयी दिल्लीः दुनिया की पॉलिटिक्स का इक्वेशन तेजी से बदल रहा है और इस बदलाव की हवा में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एक नई और ताकतवर मिलिट्री एक्सिस उभर रही है। यह नया गठबंधन भारत के लिए काफी चिंता का विषय हो सकता है।

‘ब्लूमबर्ग’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, तुर्की ने पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच 2025 में साइन हुए बाइलेटरल डिफेंस एग्रीमेंट में थर्ड पार्टी के रूप में शामिल होने में रुचि दिखाई है।

पाक-सऊदी एग्रीमेंट की मुख्य शर्त यह थी कि अगर दोनों में से किसी एक देश पर हमला होता है, तो दूसरा देश इसे अपने ऊपर हुए हमले के रूप में समझेगा और पहले देश की मदद के लिए आएगा। अब अगर इसी शर्त पर तुर्की को शामिल किया गया, तो मिडिल ईस्ट और साउथ एशिया में पावर का बैलेंस पूरी तरह बदल सकता है।

पावर का ट्रायंगल: क्या बन रहा है ‘इस्लामिक NATO’?

मिलिट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर ये तीनों देश एकजुट हो जाएं, तो एक मजबूत मिलिट्री अलायंस बन सकता है। तुर्की के TEPAV थिंक टैंक के एनालिस्ट निहात अली ओज़कान के मुताबिक, इस अलायंस में हर देश की भूमिका स्पष्ट है:

तुर्की: एडवांस्ड मिलिट्री टेक्नोलॉजी, ड्रोन और अनुभवी आर्मी (NATO में दूसरी सबसे बड़ी आर्मी)

पाकिस्तान: न्यूक्लियर पावर और बैलिस्टिक मिसाइलें

सऊदी अरब: ‘पेट्रो-डॉलर’, यानी भारी फाइनेंशियल पावर

विशेषज्ञों का कहना है कि इन तीनों के जुड़ने से बनने वाला गठबंधन असल में US के नेतृत्व वाले NATO के मॉडल पर आधारित ‘इस्लामिक NATO’ का रूप ले सकता है।

असली NATO और मिडिल ईस्ट की चिंता

तुर्की असली NATO का सदस्य है। हालांकि मिडिल ईस्ट में डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका का ध्यान NATO के बजाय इजराइल के हितों पर है। ट्रंप अमेरिकी योगदान में कटौती कर रहे हैं। इसलिए मिलिट्री विश्लेषकों का मानना है कि तुर्की अब अपनी सुरक्षा के लिए नए साथी की तलाश में है।

भारत के लिए क्यों है खतरे की घंटी?

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह नया गठबंधन भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय हो सकता है। तुर्की ने कश्मीर मुद्दे पर हमेशा पाकिस्तान का साथ दिया है। मई 2025 में भारत-पाक ‘मिनी-वॉर’ के दौरान तुर्की ने सीधे पाकिस्तान को 350 से अधिक मिलिट्री ड्रोन और ड्रोन ऑपरेटर्स की मदद दी। उस युद्ध में पाकिस्तान ने तुर्की के ‘बैराकटार TB2’ ड्रोन का इस्तेमाल किया।

सऊदी अरब के साथ दोस्ताना रिश्तों के बावजूद, यह अलायंस साउथ एशिया में भारत के लिए बड़ा खतरा है।

वेस्ट और मिडिल ईस्ट में भी चिंता

विश्लेषकों का कहना है कि पाक, सऊदी और तुर्की का यह तीन-तरफा गठजोड़ साउथ एशिया में भारत और मिडिल ईस्ट में ईरान व पश्चिमी ताकतों के लिए चुनौती पैदा करेगा। हालांकि, सुन्नी-बहुल तुर्की और सऊदी शिया-बहुल ईरान से लड़ाई के बजाय बातचीत का रास्ता चुन सकते हैं।

न्यूक्लियर हथियार और स्ट्रेटेजिक एग्रीमेंट

सितंबर 2025 में पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ के दोहा दौरे के दौरान साइन हुए ‘स्ट्रेटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट’ में यह भी शर्त है कि जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान सऊदी अरब की रक्षा के लिए न्यूक्लियर हथियार इस्तेमाल कर सकता है।

अगर तुर्की के अत्याधुनिक हथियारों को इस अलायंस में जोड़ दिया गया, तो यह निश्चित रूप से एक ताकतवर मिलिट्री गठजोड़ बन जाएगा। सवाल अब यह है कि क्या यह सिर्फ सेल्फ-डिफेंस के लिए है या वर्ल्ड वॉर की तैयारी है – यह अभी दुनिया के लिए सबसे बड़ा मिस्ट्री प्वाइंट बन गया है।

Prev Article
ईरान में 26 साल के प्रोटेस्टर को बिना ट्रायल के फांसी, जानिए कौन है इरफान?
Next Article
पाकिस्तान पीएम शहबाज़ का दावा-भारत से तनाव के बाद पाक जेट्स की डिमांड बढ़ी

Articles you may like: