इस्लामाबादः पाकिस्तान में ‘कश्मीर सॉलिडैरिटी डे’ एक बार फिर यह दिखाने का मंच बना कि कश्मीर मुद्दा वहां केवल विदेश नीति का प्रश्न नहीं, बल्कि घरेलू राजनीति, सैन्य प्रतिष्ठान और राष्ट्रीय विमर्श का साझा प्रतीक है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से लेकर राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और तीनों सेनाओं के प्रमुखों तक, सभी ने एक सुर में कश्मीरियों के प्रति “अटूट समर्थन” दोहराया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि इस मुद्दे पर पाकिस्तान के सत्ता केंद्रों में फिलहाल कोई मतभेद नहीं है।
पाक अधिकृत कश्मीर की विधानसभा में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का संबोधन इस दिन का राजनीतिक केंद्रबिंदु रहा। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों की बात दोहराते हुए कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बनने की बात कही। यह बयान अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए कम और घरेलू श्रोताओं के लिए अधिक था—एक ऐसा संदेश जिसमें राष्ट्रवाद, इतिहास और भावनात्मक अपील का मिश्रण साफ दिखाई देता है। भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को अपना अभिन्न अंग बताने की पुरानी स्थिति के बीच, पाकिस्तान का यह रुख टकराव की स्थिर रेखा को ही रेखांकित करता है।
शहबाज शरीफ ने मई 2025 के भारत–पाक संघर्ष का हवाला देकर यह दावा किया कि कश्मीर मुद्दा फिर से वैश्विक मंच पर “पूरी ताकत से” उभरा है। विश्लेषकों के अनुसार, यह बयान पाकिस्तान की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें हर क्षेत्रीय तनाव को कश्मीर से जोड़कर अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचने की कोशिश की जाती है। इसके साथ ही भारत पर “प्रॉक्सी आतंकवाद” का आरोप लगाना, पुरानी बयानबाजी का ही विस्तार माना जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम में सैन्य नेतृत्व की सक्रियता भी खास रही। फील्ड मार्शल असीम मुनीर का मुजफ्फराबाद दौरा, अग्रिम चौकी पर सैनिकों से मुलाकात और “किसी भी आक्रामक कार्रवाई का त्वरित जवाब” देने की चेतावनी, यह संकेत देती है कि कश्मीर मुद्दे को केवल कूटनीतिक नहीं बल्कि सैन्य विमर्श से भी जोड़े रखा जा रहा है। नागरिक और सैन्य नेतृत्व की यह साझा भाषा पाकिस्तान की नीति-निर्माण संरचना की वास्तविक तस्वीर पेश करती है।
राष्ट्रपति जरदारी का बयान अपेक्षाकृत औपचारिक रहा, जिसमें नैतिक, राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन की बात कही गई। वहीं, देशभर में रैलियों, सेमिनारों और एक मिनट के मौन ने यह दिखाया कि कश्मीर सॉलिडैरिटी डे को एक संगठित राष्ट्रीय आयोजन के रूप में प्रस्तुत किया गया—जहां राज्य, मीडिया और संस्थान एक साथ खड़े दिखे।
कुल मिलाकर, यह दिन कश्मीर के समाधान की दिशा में किसी नई पहल का संकेत नहीं देता, बल्कि पाकिस्तान के उस स्थायी नैरेटिव की पुनरावृत्ति करता है, जिसमें कश्मीर पहचान, राजनीति और शक्ति संतुलन का प्रतीक बना रहता है। यह भी साफ है कि जब तक यह मुद्दा घरेलू राजनीति और सैन्य विमर्श के केंद्र में रहेगा, तब तक दक्षिण एशिया में स्थायी शांति की राह जटिल बनी रहेगी।
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इस्लामाबाद: पाकिस्तान में मनाया गया ‘कश्मीर सॉलिडैरिटी डे’ एक बार फिर यह साफ करता है कि कश्मीर वहां सिर्फ विदेश नीति का मुद्दा नहीं है, बल्कि घरेलू राजनीति, सेना और राष्ट्रीय सोच का अहम हिस्सा बना हुआ है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने एक ही सुर में कश्मीरियों के प्रति “अटूट समर्थन” दोहराया। इससे यह संदेश गया कि इस मुद्दे पर पाकिस्तान के सत्ता तंत्र में फिलहाल कोई मतभेद नहीं है।
इस दिन का सबसे अहम राजनीतिक कार्यक्रम पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की विधानसभा में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का भाषण रहा। उन्होंने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का जिक्र करते हुए कहा कि कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बनना चाहिए। यह बयान अंतरराष्ट्रीय मंच से ज्यादा घरेलू जनता को ध्यान में रखकर दिया गया माना जा रहा है, जिसमें राष्ट्रवाद, इतिहास और भावनाओं का साफ असर दिखा। भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को अपना अभिन्न अंग बताने की लगातार स्थिति के बीच, पाकिस्तान का यह रुख दोनों देशों के बीच जमी हुई टकराव की रेखा को ही दोहराता है।
प्रधानमंत्री ने मई 2025 में हुए भारत-पाक तनाव का हवाला देते हुए दावा किया कि उस संघर्ष के बाद कश्मीर मुद्दा फिर से वैश्विक चर्चा में आया है। जानकारों के मुताबिक, यह पाकिस्तान की पुरानी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें हर क्षेत्रीय तनाव को कश्मीर से जोड़कर अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचने की कोशिश की जाती है। भारत पर “प्रॉक्सी आतंकवाद” का आरोप लगाना भी उसी जानी-पहचानी बयानबाजी का हिस्सा माना जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम में सेना की भूमिका भी खास नजर आई। सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर का मुजफ्फराबाद दौरा, अग्रिम चौकी पर जवानों से मुलाकात और किसी भी कार्रवाई का “तुरंत और सख्त जवाब” देने की चेतावनी यह दिखाती है कि कश्मीर मुद्दे को केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सैन्य नजरिये से भी जीवित रखा जा रहा है। नागरिक और सैन्य नेतृत्व की एक जैसी भाषा पाकिस्तान की नीति-निर्माण व्यवस्था की तस्वीर पेश करती है।
राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का बयान अपेक्षाकृत औपचारिक रहा, जिसमें उन्होंने कश्मीरियों को नैतिक, राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन देने की बात कही। वहीं देशभर में रैलियां, सेमिनार और सुबह 10 बजे एक मिनट का मौन रखकर इस दिन को एक बड़े राष्ट्रीय आयोजन के रूप में पेश किया गया, जिसमें सरकार, संस्थान और मीडिया एक साथ नजर आए।
कुल मिलाकर, ‘कश्मीर सॉलिडैरिटी डे’ किसी नए समाधान या पहल का संकेत नहीं देता, बल्कि पाकिस्तान के पुराने कश्मीर नैरेटिव की ही पुनरावृत्ति करता है। यह साफ है कि जब तक कश्मीर मुद्दा पाकिस्तान की घरेलू राजनीति और सैन्य सोच के केंद्र में रहेगा, तब तक दक्षिण एशिया में स्थायी शांति की राह आसान नहीं होगी।