सूरत : ईरान के खिलाफ अमेरिका और इज़राइल की संयुक्त सैन्य कार्रवाई के बाद मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष का असर भारत के रत्न और आभूषण क्षेत्र पर पड़ने की आशंका है। उद्योग से जुड़े लोगों के अनुसार, विशेष रूप से इज़राइल और दुबई के साथ होने वाले निर्यात-आयात पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।
हीरा कारोबारी दिनेश नवाडिया ने एएनआई से बातचीत में कहा कि बढ़ते तनाव और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में व्यवधान से व्यापार प्रभावित हो सकता है, खासकर उच्च मूल्य वाले हीरों के निर्यात पर असर पड़ेगा।
उन्होंने बताया कि अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच इजराइल को भारत का निर्यात 548.27 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा। टैरिफ संबंधी मुद्दे सुलझने के बाद मार्च 2025 से फरवरी 2026 के बीच यह निर्यात 514.20 मिलियन डॉलर रहा। उनके अनुसार इजराइल के साथ व्यापार में वृद्धि हो रही थी।
नवाडिया ने आगे बताया कि 2024-25 में इजराइल से आयात 259.17 मिलियन डॉलर का था, जबकि फरवरी 2025-26 के दौरान निर्यात 337.07 मिलियन डॉलर रहा। इससे उच्च मूल्य और सॉलिटेयर हीरों के कारोबार में स्थिर वृद्धि दिखाई देती है।
इजराइल कच्चे माल और महंगे हीरों का प्रमुख बाजार है। और भारत वहां से कच्चा माल आयात करता है। युद्ध के कारण निर्यात-आयात गतिविधियां प्रभावित होंगी। यदि संघर्ष लंबे समय तक जारी रहा तो रत्न और आभूषण क्षेत्र पर बड़ा असर पड़ सकता है। इजराइल सहित कई देशों में हवाई अड्डों के बंद होने और उड़ानों में देरी से व्यापार में बाधाएं आ सकती हैं।
दुबई के महत्व पर प्रकाश डालते हुए नवाडिया ने बताया कि 2024-25 में दुबई को निर्यात 7,868.16 मिलियन डॉलर का रहा, जबकि इसी अवधि में आयात 11,000.51 मिलियन डॉलर का था।
नवाडिया के अनुसार सूरत और मुंबई से प्रतिदिन लगभग 400 से 500 पार्सल निर्यात किए जाते हैं और दुबई के माध्यम से 250 से 300 पार्सल आयात किए जाते हैं। हालांकि उड़ानों के रद्द होने और हवाई अड्डों के बंद होने से कारोबार लगभग ठप हो गया है।
गौरतलब है कि सूरत, जिसे भारत की डायमंड सिटी कहा जाता है, वैश्विक हीरा आपूर्ति श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में शहर ने 10.55 अरब अमेरिकी डॉलर का निर्यात किया, जिसमें रत्न और आभूषण क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत रही। अमेरिका, हांगकांग और यूएई इसके प्रमुख निर्यात बाजार हैं, जबकि इजराइल और बेल्जियम भी महत्वपूर्ण साझेदार हैं।
उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर मजबूत जुड़ाव के कारण यह क्षेत्र भू-राजनीतिक अस्थिरता से प्रभावित हो सकता है। यदि मिडिल ईस्ट में अस्थिरता लंबे समय तक बनी रहती है, तो आपूर्ति श्रृंखला, कच्चे माल की उपलब्धता और निर्यात प्रतिबद्धताओं पर असर पड़ सकता है।
हितधारकों ने स्थिति पर करीबी निगरानी रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उतार-चढ़ाव की आशंका बनी हुई है।