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होर्मुज जलसंधि बंद होने से भारत की ऊर्जा और अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगने की आशंका

यदि यह समुद्री मार्ग बंद रहता है, तो भारत के तेल, गैस और निर्यात पर तुरंत असर पड़ सकता है।

नई दिल्ली: ईरान के नियंत्रण वाली होर्मुज प्राणाली बंद होने की खबर सामने आने के बाद भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था में बड़ा झटका लगने की आशंका पैदा हो गई है। विशेषज्ञों ने बताया कि यदि यह प्राणाली बंद रहती है, तो भारत के तेल, गैस और निर्यात पर तुरंत असर पड़ सकता है।

28 फरवरी 2026 को ईरान पर इजराइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के संयुक्त हमले के बाद ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को बंद कर दिया। इस रास्ते से अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही रुकने पर वैश्विक तेल आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है। भारत के लिए स्थिति खास तौर पर चिंताजनक है। भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 50 प्रतिशत इसी मार्ग से आता है। रोजाना करीब 26 लाख बैरल तेल इस रास्ते से भारत पहुंचता है। यह तेल मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत से आता है।

रसोई गैस यानी एलपीजी के मामले में भारत की निर्भरता और भी अधिक है। भारत का लगभग 100 प्रतिशत एलपीजी आयात इसी मार्ग से होता है। अगर यह रास्ता लंबे समय तक बंद रहता है, तो घरेलू गैस आपूर्ति पर सीधा असर पड़ेगा। 'प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना' जैसी योजनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं। इसके अलावा, भारत के लगभग 60 प्रतिशत एलएनजी यानी तरलीकृत प्राकृतिक गैस का आयात भी इसी मार्ग से होता है। यह गैस मुख्य रूप से कत़र और संयुक्त अरब अमीरात से आती है। कच्चे तेल की कीमत में हर 1 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत पर सालाना लगभग 200 करोड़ डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।

तेल की कीमत बढ़ने से देश में महंगाई का दबाव बढ़ेगा। इससे भारतीय रिजर्व बैंक को ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ सकती हैं। साथ ही, महंगे तेल आयात के लिए डॉलर की मांग बढ़ेगी, जिससे भारतीय मुद्रा पर दबाव पड़ सकता है। सिर्फ ऊर्जा ही नहीं, भारत का निर्यात भी प्रभावित हो सकता है। खाड़ी देशों को भारत के गैर-तेल निर्यात का लगभग 13 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग पर निर्भर है, जिसकी कुल कीमत लगभग 4760 करोड़ डॉलर है।

होर्मुज जलसंधि मध्य पूर्व का एक अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। इसकी सबसे संकरी चौड़ाई लगभग 33 से 54 किलोमीटर है। इस संकरेपन के कारण जहाजों को निर्धारित लेन में ही गुजरना पड़ता है। दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते पर निर्भर है इसलिए इसके बंद होने से न केवल भारत बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव पड़ सकता है।

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