नई दिल्लीः दिल्ली में कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री (CITI) की एक नई रिपोर्ट ने भारत के कपड़ा और परिधान उद्योग को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कच्चे कपास पर लगाया गया 11 प्रतिशत आयात शुल्क देश के टेक्सटाइल सेक्टर की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को कमजोर कर रहा है।
यह अध्ययन वैश्विक टेक्सटाइल कंसल्टेंसी Gherzi और इंटरनेशनल कॉटन एडवाइजरी कमेटी (ICAC) के सहयोग से तैयार किया गया है। इसमें कपास उत्पादन, कीमतों और व्यापार नीति के प्रभावों का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, नीतियों में बार-बार बदलाव से उद्योग में अनिश्चितता बढ़ रही है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि अगस्त से दिसंबर 2025 के बीच आयात शुल्क अस्थायी रूप से हटाया गया था, लेकिन 1 जनवरी 2026 से इसे फिर लागू कर दिया गया। इस “नीति अस्थिरता” के कारण कपड़ा मिलें दीर्घकालिक योजना बनाने में असमर्थ हैं। अध्ययन में यह भी कहा गया है कि एशिया के कई प्रतिस्पर्धी देशों में कच्चे कपास पर कोई आयात शुल्क नहीं है, जिससे भारतीय उद्योग को वैश्विक बाजार में नुकसान उठाना पड़ रहा है।
समाधान के तौर पर रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) को यह अधिकार दिया जाए कि वह मिलों को अंतरराष्ट्रीय दरों पर कपास उपलब्ध कराए। इसके लिए सरकार को लगभग ₹1,500 करोड़ का वार्षिक बफर फंड तैयार करना होगा, जिससे करीब 100 लाख बेल कपास की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।
रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि CCI को तीन महीने की घरेलू खपत के बराबर रणनीतिक भंडार रखना चाहिए, ताकि कीमतों में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित किया जा सके। यह मॉडल चीन की कपास नीति से प्रेरित बताया गया है। इसके अलावा, “कॉटन प्राइस स्टैबिलाइजेशन फंड” बनाने का सुझाव भी दिया गया है, जिसमें 5 प्रतिशत ब्याज सब्सिडी का प्रावधान हो, ताकि उद्योग को कार्यशील पूंजी की समस्या से राहत मिल सके।
CITI के चेयरमैन अश्विन चंद्रन ने कहा कि मजबूत टेक्सटाइल सेक्टर किसानों के लिए सबसे बड़ा ग्राहक बन सकता है। उन्होंने सरकार की “5F विजन”-फार्म टू फाइबर टू फैक्ट्री टू फैशन टू फॉरेन- (Farm to Fibre to Factory to Fashion to Foreign) का भी उल्लेख किया।
रिपोर्ट में यह भी चिंता जताई गई है कि कपास की उत्पादकता स्थिर बनी हुई है, जबकि उत्पादन लागत बढ़ रही है, जिससे किसानों की आय पर भी असर पड़ रहा है। कुल मिलाकर, रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यदि नीतिगत स्थिरता और संरचनात्मक सुधार नहीं किए गए तो भारत का 2030 तक 350 अरब डॉलर का टेक्सटाइल लक्ष्य और 100 अरब डॉलर निर्यात लक्ष्य हासिल करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।