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हॉर्मुज संकट से दुनिया में बड़ा संकट पैदा होने का खतरा, ईंधन के साथ रोजमर्रा की चीजों पर भी असर

युद्ध रुके तब भी नहीं सुधरेंगे हालात, सप्लाई चेन सामान्य होने में लग सकते हैं महीने

नई दिल्ली : पश्चिम एशिया में जारी तनाव और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ती अस्थिरता ने दुनिया को एक बड़े संकट की ओर धकेल दिया है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल ईंधन संकट नहीं बल्कि धीरे-धीरे “एवरीथिंग क्राइसिस” यानी हर क्षेत्र को प्रभावित करने वाला संकट बनता जा रहा है।

हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच 39 दिनों तक चले तनाव के बाद दो सप्ताह के लिए रणनीतिक विराम की सहमति बनी थी लेकिन इजरायली हमलों के चलते हालात फिर बिगड़ गए। ईरान ने हॉर्मुज क्षेत्र में कड़ी निगरानी शुरू कर दी है और यह भी तय कर रहा है कि रोज कितने जहाज इस मार्ग से गुजरेंगे। रिपोर्ट्स के अनुसार हर जहाज से लगभग 20 लाख डॉलर तक टोल वसूला जा रहा है।

तनाव इतना बढ़ गया कि ईरान ने फुजैरा की ओर बढ़ रहे एक अमेरिकी युद्धपोत को आधे घंटे में वापस लौटने की चेतावनी दी जिसके बाद जहाज को पीछे हटना पड़ा। हालांकि बयानबाजी जारी है लेकिन फिलहाल दोनों देश सीधे युद्ध से बचते दिख रहे हैं।

इस स्थिति का असर सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार यह संकट अब दैनिक जीवन की वस्तुओं तक पहुंच चुका है। बीयर, खिलौने, कॉस्मेटिक्स, नूडल्स, किडनी डायलिसिस ट्यूब से लेकर कंडोम तक कई जरूरी सामानों की आपूर्ति प्रभावित हो रही है।

छह सप्ताह से जारी इस संघर्ष के कारण तेल और गैस की सप्लाई लाइन बुरी तरह प्रभावित हुई है। एशिया में प्लास्टिक, रबर और पॉलिएस्टर के दाम तेजी से बढ़े हैं क्योंकि इनके निर्माण के लिए जरूरी पेट्रोलियम उत्पादों का आयात बाधित हुआ है। एशियाई देश जो वैश्विक उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा तैयार करते हैं, इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।

इसके उदाहरण भी सामने आ रहे हैं। दक्षिण कोरिया में डिस्पोजेबल कचरा बैग की जमाखोरी हो रही है। ताइवान में किसानों को वैक्यूम बैग नहीं मिलने से कीमतें बढ़ानी पड़ी हैं। जापान में किडनी मरीजों ने डायलिसिस ट्यूब की कमी के डर से स्टॉक करना शुरू कर दिया है। वहीं मलेशिया में मेडिकल ग्लव्स और भारत में कंडोम बनाने वाली कंपनियों ने भी कच्चे माल की कमी की बात कही है।

लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की सप्लाई भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार जो स्थिति कुछ सप्ताह पहले “सरप्लस” में थी अब “गंभीर कमी” में बदल चुकी है। एलएनजी की कीमतें जनवरी 2023 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं और आगे और बढ़ने की आशंका है।

स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई देशों ने ऊर्जा बचाने के लिए कदम उठाए हैं। श्रीलंका में सरकारी दफ्तरों के लिए चार दिन का कार्य सप्ताह लागू किया गया है। वियतनाम में वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा दिया जा रहा है जबकि पाकिस्तान ने स्कूलों में फिर से ऑनलाइन पढ़ाई शुरू कर दी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही युद्ध तुरंत खत्म हो जाए सप्लाई चेन को सामान्य होने में कई महीने लगेंगे और पूरी तरह पुराने स्तर पर लौटने में एक साल भी लग सकता है।

भारत पर भी इसका असर साफ दिख रहा है। एलएनजी सप्लाई बाधित होने से देश के आयात टर्मिनलों की क्षमता उपयोग में भारी गिरावट आई है। दहेज टर्मिनल जो फरवरी में 94% क्षमता पर चल रहा था अप्रैल की शुरुआत में 52% पर आ गया। पिछले दो महीनों में देश के सभी टर्मिनलों का उपयोग तीन साल के निचले स्तर पर पहुंच गया है।

इसके अलावा गैस बुकिंग में दिक्कतें बढ़ी हैं और कई उद्योगों ने अपने उत्पादों के दाम बढ़ा दिए हैं। उपभोक्ता वस्तु कंपनियों ने कीमतों में 5 से 15 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की है। तांबे की कीमत बढ़ने से एयर कंडीशनर की कीमतें भी 7 से 12 प्रतिशत तक बढ़ी हैं।

उद्योग जगत का मानना है कि युद्धविराम या शांति समझौते के बाद भी हालात तुरंत सामान्य नहीं होंगे। कंपनियों को कच्चे माल की महंगी खरीद से हुए नुकसान की भरपाई करनी है इसलिए कीमतों में जल्द कमी की उम्मीद कम है।

कुल मिलाकर हॉर्मुज संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां सिर्फ ईंधन ही नहीं बल्कि रोजमर्रा की लगभग हर चीज प्रभावित हो रही है।

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