नई दिल्ली : कूटनीतिक स्तर पर दौरे हो रहे हैं, उड़ान सेवाएं फिर से शुरू हो रही हैं और दोनों देशों के बीच नियमित बातचीत चल रही है। ये सभी संकेत बताते हैं कि भारत और चीन के रिश्तों में जमी हुई बर्फ अब पिघलने लगी है। इन सकारात्मक संकेतों को देखते हुए, नई दिल्ली अब चीनी निवेश को लेकर अपना रुख थोड़ा नरम करने की संभावना पर विचार कर रही है।
2020 में लागू किए गए प्रेस नोट 3 के तहत जिन देशों के साथ भारत की स्थलीय सीमा लगती है, उन देशों से आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य कर दी गई थी। माना जाता है कि मुख्य रूप से भारत में चीनी कंपनियों के निवेश को नियंत्रित करने के उद्देश्य से ही प्रेस नोट 3 लागू किया गया था। अब उसी ढांचे को बनाए रखते हुए छोटे निवेश के मामलों में ‘डी मिनिमिस’ सीमा लागू करने के मुद्दे पर सरकार के भीतर समीक्षा चल रही है। इसका उद्देश्य छोटे निवेशों को तेजी से मंजूरी देना है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार प्रेस नोट 3 को वापस नहीं लिया जाएगा। रणनीतिक और संवेदनशील क्षेत्रों में कड़ी निगरानी जारी रहेगी। हालांकि कम मूल्य या छोटी हिस्सेदारी वाले निवेश को स्वचालित मंजूरी देने की संभावना पर विचार किया जा रहा है। सरकार इस बात की समीक्षा कर रही है कि क्या सीमित और कम जोखिम वाले निवेश के लिए प्रक्रिया को सरल बनाया जा सकता है।
उद्योग जगत लंबे समय से इस संबंध में संतुलित नीति की मांग करता रहा है। उनका कहना है कि बाजार की वास्तविक स्थिति, रणनीतिक सतर्कता और औद्योगिक विकास इन तीनों के बीच संतुलन आवश्यक है। इसी उद्देश्य से वर्तमान नीति की पुनर्समीक्षा की जा रही है।
कुछ महीने पहले घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों के संयुक्त उपक्रमों में चीनी हिस्सेदारी को 26 प्रतिशत तक सीमित करने का प्रस्ताव दिया गया था। यह सोच इस आधार पर बनी कि चीनी कंपनियां पूंजी, तकनीक और विकसित सप्लाई चेन से जुड़ाव का लाभ दे सकती हैं। हिस्सेदारी सीमित रखने से नियंत्रण घरेलू कंपनियों के हाथ में रहेगा, और साथ ही तकनीक व पूंजी की आपूर्ति भी सुनिश्चित होगी। इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहन और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने के लिए समन्वित सप्लाई चेन आवश्यक है और इस मामले में चीन अब भी काफी आगे है।
वर्तमान में प्रेस नोट 3 के कारण छोटी हिस्सेदारी या पहले से स्वीकृत परियोजनाओं में अतिरिक्त निवेश के मामलों में भी देरी हो रही है, ऐसा उद्योग जगत का आरोप है। पूंजी-प्रधान उद्योगों में विस्तार रोककर मंजूरी का इंतजार करना मुश्किल होता है, इसलिए औपचारिक स्वीकृति लंबित रहने के बावजूद कुछ कंपनियां व्यावसायिक व्यवस्थाएं आगे बढ़ा रही हैं। इससे प्रशासनिक समयसीमा और व्यावसायिक जरूरतों के बीच तनाव और स्पष्ट हो रहा है। प्रस्तावित
‘डी मिनिमिस’ सीमा लागू होने पर कम जोखिम वाले छोटे निवेशों को तेज मंजूरी मिल सकती है, जबकि बड़े या संवेदनशील निवेश प्रस्तावों पर कड़ी निगरानी जारी रहेगी।
अर्थशास्त्री सज्जिद चिनॉय के अनुसार केवल शुल्क लगाने के बजाय सावधानीपूर्वक चीनी FDI आकर्षित करना अधिक प्रभावी हो सकता है। उनका तर्क है कि अल्पकाल में शुल्क सुरक्षा दे सकता है, लेकिन दीर्घकाल में निवेश ही घरेलू क्षमता निर्माण के लिए आवश्यक है। नियंत्रित शर्तों के तहत चीनी पूंजी आने पर मूल्य श्रृंखला के कुछ हिस्से भारत में स्थानांतरित हो सकते हैं, जिससे रोजगार और तकनीकी दक्षता बढ़ेगी।
‘मेक इन इंडिया’ जैसी पहलों का उद्देश्य भी घरेलू उत्पादन को मजबूत करना है और सीमित हिस्सेदारी वाले संयुक्त उपक्रम या संरचित साझेदारी इस लक्ष्य को हासिल करने में सहायक हो सकते हैं।
हालांकि राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में संबंधित सभी मंत्रालयों द्वारा सुरक्षा जांच जारी रहेगी, यह स्पष्ट संकेत मिला है। जब भारत अंतरराष्ट्रीय पूंजी के लिए प्रतिस्पर्धा में शामिल है, तब प्रक्रियात्मक अनिश्चितता निवेश को अन्य देशों की ओर मोड़ सकती है। वहीं चीनी कंपनियां भी विकसित बाजारों में व्यापारिक बाधाओं का सामना कर वैकल्पिक अवसर तलाश रही हैं। ऐसे में भारत का विशाल बाजार और केंद्र की पीएलआई योजना उन्हें यहां निवेश के लिए आकर्षित कर सकती है।