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भारतीय बीमा क्षेत्र में बड़ा बदलाव: अब 100% विदेशी निवेश की अनुमति

देश के बीमा क्षेत्र में विदेशी स्वामित्व की अधिकतम सीमा 74 प्रतिशत थी।

By सुदीप्त बनर्जी, Posted by : राखी मल्लिक

Feb 13, 2026 16:09 IST

नई दिल्ली : देश के बीमा क्षेत्र में बड़े स्तर के नीतिगत बदलाव की घोषणा की गई है। गुरुवार को वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीनस्थ उद्योग विकास एवं अंतरिक व्यापार विभाग ने औपचारिक रूप से बताया कि अब से भारतीय बीमा कंपनियों में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति दी जाएगी। यह अनुमति स्वतः ही दी जाएगी।

यानी विदेशी निवेशक अब सरकारी मंजूरी की प्रतीक्षा किए बिना भारतीय बीमा कंपनियों में पूर्ण स्वामित्व ले सकेंगे। पहले देश के बीमा क्षेत्र में विदेशी स्वामित्व की अधिकतम सीमा 74 प्रतिशत थी। नई नीति में यह सीमा हटा दी गई है और पूर्ण विदेशी स्वामित्व के दरवाजे खोल दिए गए हैं।

हालांकि लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के मामले में अलग नियम लागू रहेगा। देश की सबसे बड़ी सरकारी जीवन बीमा कंपनी में विदेशी निवेश की सीमा पहले की तरह 20 प्रतिशत ही रहेगी। नई नीति में एक और महत्वपूर्ण शर्त जोड़ी गई है — किसी भी भारतीय बीमा कंपनी में विदेशी निवेश होने पर, अध्यक्ष, प्रबंध निदेशक या सीईओ में से कम से कम एक व्यक्ति भारतीय निवासी होना चाहिए। इससे देशीय नियंत्रण बरकरार रहेगा, ऐसा सरकार का दावा है।

संसद में ‘सबका बीमा सबकी रक्षा (बीमा कानून संशोधन) बिल, 2025’ पारित होने के साथ ही यह नया नियम लागू हो गया। पिछले दिसंबर में बिल को पारित किए जाने के बाद इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा गया। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन गया। कानून की अधिकांश धाराएं 5 फरवरी से लागू हो गई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार देश के बीमा बाजार में दीर्घकालिक विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए यह कदम उठाया गया है।

हालांकि स्वामित्व संरचना बदलने से प्रीमियम तुरंत कम होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। क्लेम सेटलमेंट रेशियो, नियामक नियम, री-इंश्योरेंस का खर्च और जोखिम मूल्यांकन जैसे कई कारकों पर भारत में बीमा की कीमत निर्भर करती है। फिर भी पूंजी के प्रवाह से कंपनियां अपने वितरण नेटवर्क का विस्तार, तकनीक में निवेश, जोखिम मूल्यांकन प्रक्रिया में सुधार और ग्राहकों की जरूरतों के अनुसार नए बीमा उत्पाद ला सकेंगी। इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, सेवा का स्तर सुधरेगा और वित्तीय समावेशन की गति भी बढ़ सकती है।

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