कोलकाता : कोलकाता के साहित्यिक संसार में एक अनोखा और जीवंत नाम है- प्रदीप, जिन्हें बंगला जगत में स्नेह से ‘अलक दा’ कहा जाता है। पिछले तीन दशकों से अधिक समय से वे लगातार लेखन, कविता-पाठ और लिटिल मैगज़ीन संस्कृति को जीवित रखने का कार्य कर रहे हैं। स्वयं को वे मज़ाकिया अंदाज में “साहित्य का फेरीवाला” कहते हैं लेकिन वास्तव में उनका योगदान किसी गंभीर साहित्यिक आंदोलन से कम नहीं है।
प्रदीप का लेखन दो रूपों में सामने आता है। एक ओर वे हास्य और रोचक आँकड़ों के माध्यम से पाठकों को आकर्षित करते हैं वहीं दूसरी ओर बच्चों से जुड़े मुद्दों को विशेष महत्व देते हैं। कविता, छोटी कहानियाँ और चुटकुले उनकी रचनाओं की मुख्य विशेषता हैं। उनकी रचनाओं में सामाजिक संवेदना के साथ-साथ सहज भाषा और सरल अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। उनकी पत्रिकाओं के चित्रांकन कलाकार किया कर्मकार द्वारा किया गया है जो रचनाओं को और प्रभावशाली बनाता है।
वर्ष 1978 में कॉलेज से उत्तीर्ण होने के बाद से ही प्रदीप साहित्य से जुड़े रहे हैं। उन्होंने बताया कि वे अपनी छोटी-छोटी लिटिल मैगज़ीन, जो लगभग पाँच से दस पृष्ठों की होती हैं, बहुत कम कीमत मात्र 10 रूपये में पाठकों तक पहुँचाते हैं। ये पत्रिकाएँ वे प्रायः लिटील मैगज़ीन पैवेलियन के पास और पुस्तक मेला प्रांगण के आसपास स्वयं बेचते हैं।
कोलकाता पुस्तक मेला जिसकी शुरुआत 1976 में हुई थी उसके आरंभिक वर्षों से लेकर आज तक प्रदीप लगातार हर मेले में उपस्थित रहे हैं। इसी निरंतरता के कारण वे अब कोलकाता पुस्तक मेले के एक आइकॉन बन चुके हैं। बउबाजार क्षेत्र में रहने वाले प्रदीप को आज असंख्य पाठक पहचानते हैं और उनका इंतज़ार करते हैं जो साहित्य के प्रति उनकी निष्ठा का प्रमाण है।