कोलकाता: स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के तहत इस बार चुनाव आयोग ने जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) यानी जिलाधीशों पर सख्ती बढ़ा दी है। आयोग का साफ निर्देश है कि वोटर लिस्ट में एक भी अवैध नाम नहीं रहना चाहिए। इसके लिए हर जिले में DEO को खुद निगरानी करते हुए मतदाता सूची की गहन जांच, झाड़ाई-छंटाई और सुपर-चेकिंग करनी होगी। यह पूरी प्रक्रिया वर्ष 2002 की मतदाता सूची में मौजूद लिंकिंग के आधार पर की जाएगी। अगर किसी तरह की गड़बड़ी सामने आती है, तो उसे सीधे तौर पर संबंधित DEO की निगरानी में कमी माना जाएगा।
राज्य के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी (Additional CEO) ने चिट्ठी के जरिए सभी DEO को याद दिलाया है कि चुनाव आयोग चार रोल ऑब्जर्वर भेज रहा है। ये ऑब्जर्वर कभी CEO कार्यालय में बैठकर और कभी जिलों में जाकर ड्राफ्ट वोटर लिस्ट की रैंडम जांच करेंगे। अगर उनकी जांच में गंभीर विसंगति पाई जाती है, तो यह माना जाएगा कि संबंधित DEO की ओर से उचित निगरानी नहीं की गई। इसी वजह से अभी से हर जिले में विशेष टीम गठित कर एन्यूमरेशन फॉर्म की जांच कराने की सलाह दी गई है।
लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी और अनमैप्ड मतदाताओं को लेकर राजनीतिक विवाद सामने आने से चुनाव आयोग नाराज़ है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल ने इसके लिए राज्य प्रशासन के एक हिस्से और कुछ राजनीतिक रूप से प्रभावित बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर), ईआरओ (इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर) और एईआरओ (अतिरिक्त ईआरओ) को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि पूरे काम की ठीक से निगरानी नहीं हुई और इसमें DEO की भी भूमिका रही।
इसके बाद चुनाव आयोग ने बीएलओ से लेकर DEO तक सभी को जवाबदेह बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। आयोग ने साफ कर दिया है कि राजनीतिक दल कुछ भी कहें, लेकिन चुनाव आयोग की नीति बिल्कुल स्पष्ट है-एक भी वैध मतदाता का नाम वोटर लिस्ट से नहीं कटना चाहिए और एक भी अवैध मतदाता का नाम सूची में नहीं रहना चाहिए।
इसी कारण DEO पर दबाव बढ़ाने के साथ-साथ बीएलओ को ऐप के जरिए भेजी गई गाइडलाइन में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं। कहा गया है कि वर्ष 2002 की SIR सूची में नाम होने के बावजूद जिन मतदाताओं की किसी कारण से मैपिंग नहीं हो पाई है, उनकी पूरी जानकारी जुटाकर अपलोड करनी होगी और उसे ‘सर्टिफाई’ भी करना होगा। तकनीकी कारणों से अगर मैपिंग नहीं हुई है, तो ऐसे मामलों में मतदाताओं को सुनवाई के लिए बुलाने की जरूरत नहीं है। उस स्थिति में बीएलओ को खुद संबंधित मतदाता के घर जाकर दस्तावेज़ों की जांच करनी होगी और जानकारी दोबारा अपलोड करनी होगी। हालांकि आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि ‘प्रोजेनी मैपिंग’ वाले मतदाताओं को सुनवाई के लिए जरूर बुलाया जाएगा।