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‘उजालों के बदलते रंग’ काव्य संग्रह और ‘सदीनामा’ स्त्री विशेषांक का लोकार्पण

काव्य संग्रह पर चर्चा के साथ कवियों ने किया भावपूर्ण काव्य पाठ।

By रजनीश प्रसाद

Apr 11, 2026 19:50 IST

कोलकाता : डॉ. रजनी शाह के काव्य संग्रह ‘उजालों के बदलते रंग’ तथा पत्रिका ‘सदीनामा’ के स्त्री विशेषांक का लोकार्पण कोलकाता के प्रतिष्ठित साहित्यकारों और गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में संपन्न हुआ।

कार्यक्रम की शुरुआत प्रसिद्ध दिवंगत चित्रकार सुलोचना सारस्वत पर केंद्रित सदीनामा के 'स्त्री विशेषांक' के लोकार्पण से हुई। इस अवसर पर उनके सुलोचना के भाई भवानीशंकर सारस्वत, लक्ष्मण केडिया आदि ने उनसे जुड़ी स्मृतियां साझा कीं। इसके बाद डॉ. रजनी शाह के काव्य संग्रह ‘उजालों के बदलते रंग’ पर विस्तार से चर्चा की गई।

डॉ. विमलेश त्रिपाठी ने पुस्तक पर अपने विचार रखते हुए कहा कि युद्ध और संवेदनहीनता के इस दौर में, जब रोशनी होते हुए भी दिखाई नहीं देती, ऐसे समय में इस काव्य संग्रह का प्रकाशन अत्यंत सराहनीय है।

सेराज खान बातिश ने कहा कि कविता का मूल भाव स्पष्ट होना चाहिए। आज के समय में कविता का अत्यधिक सरलीकरण हो गया है, लेकिन रजनी शाह की कविताएँ साफ-सुथरी, सशक्त और त्रुटिरहित हैं।

अजयेंदनाथ त्रिवेदी ने कहा कि रजनी शाह की कई कविताएँ जीवन के विविध आयामों को बेहद सलीके से प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने संग्रह की पंक्तियों-“जिंदगी संभव है अगर जीना चाहे” और “जिंदगी बड़ी अजीब है” का उल्लेख करते हुए इसकी संवेदनशीलता को रेखांकित किया।

डॉ. गीता दुबे ने कहा कि किसी स्त्री की रचना में उसकी भाषा का विशेष महत्व होता है। उन्होंने रजनी शाह की सरल, सहज और प्रभावशाली भाषा की सराहना की। उनके अनुसार यह संग्रह अनुभूतियों पर आधारित है, जिसे कवयित्री ने बड़ी सहजता से अभिव्यक्त किया है। उन्होंने संग्रह की पंक्तियाँ-“कुत्ता इंसान को पहचान लेता है, लेकिन इंसान इंसान को नहीं पहचानता” और “सफर कैसे भी करे, संघर्ष निश्चित है” को विशेष रूप से उल्लेखनीय बताया। साथ ही, “एक टोकरी हिम्मत होनी चाहिए” जैसी अभिव्यक्ति को भी सराहा।

स्वयं कवयित्री डॉ. रजनी शाह ने कहा कि हर व्यक्ति के भीतर एक कवि होता है, लेकिन लिखने की इच्छा का अभाव उसे रोकता है। उन्होंने बताया कि उनकी कविताएँ जीवन के विभिन्न रूपों को सामने लाने का प्रयास हैं।

कार्यक्रम के उद्घाटनकर्ता एवं मुख्य वक्ता विश्वंभर नेवर ने कहा कि जब तक ज्ञान है, तब तक उजाला है; ज्ञान के बिना सब व्यर्थ है। उन्होंने कवि नीरज की पंक्तियाँ—“मानव होना भाग्य, कवि होना सौभाग्य” उद्धृत करते हुए कहा कि कठिन समय में कविता लिखना और उसका प्रकाशन करना एक बड़ी उपलब्धि है।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में काव्य पाठ का आयोजन किया गया, जिसमें शैलेंद्र शांत, डॉ. ब्रज मोहन सिंह, जयकुमार रुसवा, रावेल पुष्प, रचना सरन, राम पुकार सिंह, विमलेश त्रिपाठी और शकुन त्रिवेदी सहित कई कवियों ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं।

कार्यक्रम के संयोजक एवं संचालक जितेंद्र जीतांशु ने कहा कि संघर्ष और सृजन को साथ लेकर चलना आसान नहीं होता, लेकिन डॉ. रजनी शाह ने अपने काव्य संग्रह के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया कि दृढ़ इच्छा शक्ति से सब संभव है। समारोह में डी. सोनकर, हीरालाल शाह, कंचन प्रसाद, शिव शंकर सिंह सुमित, विशन सिंह सिखवाल, डॉ. किरण सिपानी, सुरेश शॉ, स्वीटी मोदी, अमित राय, सत्य प्रकाश दुबे, सविता भुवानिया, उमा सरकार, प्रीति शाह, सुरेंद्र सिंह, विनोद यादव, सविता पोद्दार, कैलाश शर्मा, संजीव कुमार दुबे, डॉ. उर्वशी श्रीवास्तव, रंजना झा, अश्विनी कुमार, सुशीला सुराणा, प्रणति ठाकुर, विश्वजीत ठाकुर, मनोज रंजन, राजेंद्र मिश्रा, मनोज मिश्रा, के. सुब्रमण्यम, मोहन चतुर्वेदी वैरागी, गिर्राज किशोर अरेला, प्रदीप धानुक, ओमप्रकाश चौबे और रोशन मुरारका सहित अनेक साहित्यप्रेमियों की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम को यादगार बना दिया। कार्यक्रम में मीनाक्षी सांगानेरिया, कंचन प्रसाद और सदीनामा टीम की विशेष भूमिका रही।

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