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‘चुनाव टालना चाहती है बीजेपी’, 60 लाख ‘विचाराधीन’ मामलों का निपटारा कुछ हफ्तों में कैसे? अभिषेक ने उठाए सवाल

शनिवार को चुनाव आयोग ने अंतिम मतदाता सूची (पहला चरण) प्रकाशित की। इससे पहले प्रारूप सूची में ही 58,20,899 नाम हटाए गए थे।

By देवदीप चक्रवर्ती, Posted by डॉ.अभिज्ञात

Mar 01, 2026 22:12 IST

कोलकाताः मार्च के मध्य में यदि चुनाव की घोषणा करनी है, तो इस बीच 60 लाख ‘विचाराधीन’ मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच कर उनका निपटारा कैसे संभव है? रविवार को पत्रकार वार्ता कर तृणमूल कांग्रेस के अखिल भारतीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने यह सवाल उठाया।

उनका दावा है कि वास्तव में 14 लाख ‘Under Adjudicated’ नाम न्यायिक अधिकारियों को भेजे जाने थे, लेकिन ‘जानबूझकर’ 60 लाख से अधिक नाम भेज दिए गए। उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि दस्तावेजों की जांच के दौरान न्यायिक अधिकारियों को फोन कर धमकियां दी जा रही हैं।

अभिषेक ने बताया कि लोगों की कथित परेशानियों के विरोध में 6 मार्च को धर्मतला के मेट्रो चैनल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी धरने पर बैठेंगी।

60 लाख ‘विचाराधीन’ मामलों की जांच कैसे पूरी होगी?

शनिवार को चुनाव आयोग ने अंतिम मतदाता सूची (पहला चरण) जारी की। इससे पहले प्रारूप सूची में 58,20,899 नाम हटाए गए थे, जिनमें मुख्यतः मृत, फर्जी और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हैं।

एसआईआर की सुनवाई प्रक्रिया के बाद 5,46,053 और नाम हटाए गए। फिलहाल 60,06,675 नाम ‘विचाराधीन’ हैं।

अभिषेक का तर्क है, “न्यायिक अधिकारी भी इंसान हैं। उनके पास कोई जादुई छड़ी या विशेष सॉफ्टवेयर नहीं है। 60 लाख मामले विचाराधीन हैं और कुल मिलाकर लगभग 500 न्यायिक अधिकारी काम कर रहे हैं। यदि एक दिन में 20-30 मामलों का निपटारा होता है तो प्रतिदिन 10-15 हजार मामले ही निपटेंगे। 60 लाख मामलों के निपटारे में कम से कम चार महीने लगेंगे। फिर चुनाव कैसे होंगे?”

‘चुनाव टालना चाहती है बीजेपी’

अभिषेक ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के काम के पीछे बीजेपी का ‘इशारा’ है। उन्होंने कहा, “बीजेपी नहीं चाहती कि अभी चुनाव हों। बीजेपी का एक हिस्सा न्याय व्यवस्था का उपयोग कर चुनाव टालना चाहता है क्योंकि उन्हें पता है कि चुनाव में जाने पर वे हार जाएंगे।”

मुख्य चुनाव आयुक्त पर भी निशाना

अभिषेक ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “जब हम बैठक में गए थे, तब कहा गया था कि यदि किसी का नाम प्रारूप सूची में है तो उसे हटाया नहीं जाएगा क्योंकि मैपिंग हो चुकी है। यदि नाम होने के बावजूद आप उसे हटाते हैं तो बैठक में कही गई बातों को सार्वजनिक करेंगे और सुप्रीम कोर्ट में भी पेश करेंगे। बचने का रास्ता नहीं मिलेगा।”

न्यायिक अधिकारियों को धमकाने का आरोप

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद न्यायिक अधिकारियों को बुलाकर एसओपी (मानक कार्यप्रणाली) बनाने पर भी अभिषेक ने सवाल उठाया। उनका आरोप है कि पर्यवेक्षकों के फोन से न्यायिक अधिकारियों को धमकी दी गई। “करीब 20 न्यायिक अधिकारियों ने मुझे इसकी जानकारी दी है। किसने यह अधिकार दिया?”

एसआईआर प्रक्रिया के खिलाफ पहले भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर चुकी हैं और स्वयं पैरवी भी की है।

अब 6 मार्च को धर्मतला के मेट्रो चैनल में धरने की घोषणा की गई है। उल्लेखनीय है कि इसी मेट्रो चैनल में सिंगूर आंदोलन के दौरान ममता बनर्जी ने अनशन किया था।

अभिषेक ने कहा कि एसआईआर प्रक्रिया की कथित विसंगतियों को सुप्रीम कोर्ट में भी उठाया जाएगा। साथ ही जिन मतदाताओं के नाम ‘विचाराधीन’ हैं, उनके दस्तावेजी मामलों में पार्टी कार्यकर्ताओं को सहायता करने के निर्देश दिए गए हैं।

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