नयी दिल्लीः केंद्रीय बजट हमेशा आम नागरिकों की उम्मीदों का पर्व होता है। जैसे त्योहारों पर बच्चों को नए कपड़े मिलते हैं, वैसे ही बजट के दिन लोगों को राहत की आस रहती है-महंगाई में कमी, जरूरी चीजों के दाम नीचे आने की उम्मीद और इनकम टैक्स में कुछ और छूट की चाह। इस बार भी देशवासियों की निगाहें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर टिकी हैं, लेकिन हालात पहले से कहीं ज्यादा जटिल हैं।
पिछले एक साल में वैश्विक स्तर पर बने दबावों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लगातार चुनौती दी है। खास तौर पर ट्रंप-टैरिफ और अमेरिकी नीतिगत सख्ती का असर भारतीय कारोबार पर साफ दिखा। हाल ही में आए इकोनॉमिक सर्वे ने भी संकेत दिया कि आने वाला वक्त पूरी तरह सहज नहीं है। भले ही ग्रोथ रेट के 6.5% से बढ़कर 7% तक पहुंचने की संभावना जताई गई हो, लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी गई है कि वैश्विक मंदी जैसी स्थिति दोबारा बनने का खतरा पूरी तरह टला नहीं है।
अनिश्चितता सिर्फ ग्लोबल इकोनॉमी तक सीमित नहीं है। डॉलर के मजबूत होने, सोने-चांदी की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव और विदेशी निवेशकों की सतर्कता ने नीति-निर्माताओं की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। भारत जैसे देश के लिए, जो हर साल भारी मात्रा में सोना आयात करता है, यह एक ‘कैच-22’ स्थिति बन गई है-सस्ते दाम पर खरीदें तो महंगे डॉलर का दबाव, न खरीदें तो भविष्य का मौका चूकने का खतरा।
इन हालात में वित्त मंत्री के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्राथमिकता किसे दी जाए। क्या इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बढ़ाकर विकास को रफ्तार दी जाए, या फिर ट्रेड और ट्रेजरी डेफिसिट को संभालने के लिए कारोबारी जगत को राहत दी जाए? डॉलर की मजबूती और सीमित संसाधनों के बीच संतुलन साधना आसान नहीं है।
सूत्रों के मुताबिक, लगातार नौवीं बार बजट पेश कर रहीं निर्मला सीतारमण इस बार पारंपरिक रास्ते से हटकर सोच सकती हैं। माना जा रहा है कि टैक्स प्रस्तावों वाले पार्ट-B में ही आने वाले समय के लिए सरकार का बड़ा आर्थिक रोडमैप पेश किया जा सकता है। संदेश साफ हो सकता है-अनिश्चितता के दौर में भी भारत ‘ऑफेंस इज द बेस्ट डिफेंस’ की रणनीति अपनाएगा।
संकेत हैं कि एक्सपोर्ट और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए नए प्रस्ताव सामने आ सकते हैं, ताकि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत रख सके। बजट के जरिये यह भी बताया जा सकता है कि आने वाले वर्षों में देश किस दिशा में आगे बढ़ेगा।
अनिश्चितताओं से घिरे इस मैच में वित्त मंत्री पूरे आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरी हैं। उनके फैसले कितने कारगर साबित होंगे, इसका जवाब आने वाला वक्त देगा-लेकिन इतना तय है कि यूनियन बजट 2026 सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक दिशा तय करने वाला दस्तावेज होगा।