नई दिल्ली: पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने रविवार को कहा कि संसद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किया गया केंद्रीय बजट आर्थिक रणनीति और आर्थिक दूरदर्शिताकी कसौटी पर विफल रहा है। यहाँ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए चिदंबरम ने कहा कि उन्हें संदेह है कि वित्त मंत्री और सरकार ने आर्थिक सर्वेक्षण 2025 छब्बीस पढ़ा भी है या नहीं और अगर पढ़ा भी है तो उन्होंने उसमें चिह्नित चुनौतियोंको नज़रअंदाज़ करने का फैसला किया है तथा लोगों पर शब्दों की बारिश करने के अपने पसंदीदा शगल पर लौट आए हैं।
उन्होंने कहा, “हर बजट-पूर्व टिप्पणीकार और लेखक और अर्थशास्त्र के हर छात्र को आज संसद में वित्त मंत्री के भाषण में जो सुना- उससे हैरान होना चाहिए। मैं मानता हूँ कि बजट केवल वार्षिक आय और व्यय का बयान नहीं होता। मौजूदा परिस्थितियों में बजट भाषण को कुछ दिन पहले जारी आर्थिक सर्वेक्षण में बताई गई प्रमुख चुनौतियों को संबोधित करने वाली एक स्पष्ट कथा प्रस्तुत करनी चाहिए। चिदंबरम ने कहा कि आर्थिक सर्वेक्षण और कई जानकार विशेषज्ञों द्वारा चिह्नत कम से कम 10 चुनौतियों की वह गिनती कर सकते हैं।
उन्होंने बजट 2026 सत्ताईस की कमियाँ गिनाते हुए कहा कि आर्थिक सर्वेक्षण 2025 छब्बीस की अनदेखी की गयी और बजट भाषण में सर्वेक्षण में चिन्हित प्रमुख चुनौतियों का समाधान नहीं बताया गया है। स्पष्ट आर्थिक रणनीति का अभाव है और बजट में दीर्घकालिक आर्थिक दिशा या रोडमैप नहीं। आर्थिक स्टेट्समैनशिप की कमी है बड़े सुधारों के बजाय शब्दों और संक्षेपों पर ज़ोर है। अमेरिका के दंडात्मक टैरिफ का समाधान नहीं है और निर्यातकों पर बढ़े दबाव से निपटने की कोई ठोस योजना नहीं है। लंबे व्यापार संघर्षों पर चुप्पी है और वैश्विक व्यापार तनाव और निवेश पर असर को नजरअंदाज किया गया है। चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे पर कोई रणनीति नहीं है। निजी निवेश में गिरावट का समाधान नहीं है और ना ही निजी क्षेत्र की निवेश अनिच्छा पर कोई भरोसेमंद उपाय नहीं है। सकल स्थिर पूंजी निर्माण यानी GFCF का निम्न स्तर लगभग 30 प्रतिशत पर अटका है जिसमें सुधार के संकेत नहीं हैं। FDI को लेकर अनिश्चितता है। विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए नए कदमों का अभाव है। FPI के लगातार बहिर्गमन पर कोई जवाब नहीं है। राजकोषीय समेकन की बेहद धीमी गति और FRBM लक्ष्यों से भटकाव जारी है।
चिदंबरम् ने कहा कि प्रस्तावित बजट में उच्च राजकोषीय और राजस्व घाटा घटाने के लिए साहसिक कदम नहीं है। महँगाई के आधिकारिक आंकड़ों और जमीनी हकीकत में अंतर है। घरेलू खर्च- शिक्षा- स्वास्थ्य और परिवहन की बढ़ती लागत पर चुप्पी है। लाखों MSME बंद होने पर कोई ठोस राहत नहीं है। रोज़गार संकट- विशेषकर युवा बेरोज़गारी की अनदेखी की गयी है। शहरी बुनियादी ढाँचे की बदहाली पर कोई फोकस नहीं है। पूंजीगत व्यय में कटौती है और केंद्र और राज्यों दोनों के स्तर पर निवेश घटा है। राजस्व और व्यय लक्ष्यों में भारी कमी की कोई व्याख्या नहीं है। जल जीवन मिशन जैसी अहम योजना में भारी कटौती की गयी है और 67000 करोड़ से घटाकर मात्र 17000 करोड़ किया गया है। योजनाओं और मिशनों की भरमार है जिनके क्रियान्वयन पर संदेह है। नई घोषणाएँ की गयी हैं लेकिन टिकाऊ परिणामों की गारंटी नहीं है।