शिमला : हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं, सुरक्षा व्यवस्था और शिक्षा गुणवत्ता से जुड़ी गंभीर खामियाँ सामने आई है जिससे ‘शिक्षा का अधिकार’ (आरटीई) कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। यह स्थिति मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के गृह जिले में विशेष रूप से चिंता का विषय मानी जा रही है।
हमीरपुर में सोमवार को आयोजित सार्वजनिक सुनवाई के दौरान सामाजिक अंकेक्षण (सोशल ऑडिट) की विस्तृत रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें 500 से अधिक हितधारकों ने भाग लिया। इनमें अभिभावक, शिक्षक, स्कूल प्रबंधन समिति (एसएमसी) के सदस्य, जनप्रतिनिधि, शिक्षा अधिकारी और स्थानीय समुदाय के लोग शामिल थे। इस अवसर पर हमीरपुर के शिक्षा गुणवत्ता उपनिदेशक नवीन शर्मा भी उपस्थित रहे और उन्होंने रिपोर्ट का अवलोकन किया।
रिपोर्ट के अनुसार स्कूलों में छात्र सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों में गंभीर कमियाँ पाई गईं। 32 प्रतिशत से अधिक स्कूलों में स्कूल सुरक्षा समितियों का गठन ही नहीं किया गया है, जिससे आपदा प्रबंधन, मानसिक उत्पीड़न और यौन शोषण जैसे जोखिमों से बच्चों की सुरक्षा कमजोर पड़ती है। इसके अलावा 27 प्रतिशत स्कूलों में न तो बाउंड्री वॉल है और न ही फेंसिंग, जिससे विशेषकर छात्राओं की सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ जाती है।
समावेशी शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थिति कमजोर पाई गई। लगभग 84 प्रतिशत स्कूलों में दिव्यांग बच्चों के लिए बाधारहित (बैरियर-फ्री) पहुँच उपलब्ध नहीं है। साथ ही 63 प्रतिशत स्कूलों में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए अनुकूल शौचालय नहीं पाए गए। वही परामर्श सेवाओं (काउंसलिंग) की सुविधा किसी भी स्कूल में उपलब्ध नहीं पाई गई, जिससे बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास से जुड़ी सहायता व्यवस्था पूरी तरह कमजोर नजर आई।
स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधाओं में भी कई खामियाँ उजागर हुईं। रिपोर्ट के अनुसार 92 प्रतिशत स्कूलों में पेयजल सुविधा तो उपलब्ध है, लेकिन 97 प्रतिशत स्कूलों में बच्चों के लिए प्रमाणित और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा 19 प्रतिशत स्कूलों में किशोर छात्राओं को सैनिटरी पैड उपलब्ध नहीं कराए जाते, जिससे उनकी उपस्थिति और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होते हैं।
बुनियादी ढांचे की स्थिति भी संतोषजनक नहीं पाई गई। लगभग 8 प्रतिशत स्कूलों में कक्षाओं और शिक्षण-अशिक्षण स्टाफ के लिए पर्याप्त कमरे नहीं हैं, जिससे शैक्षणिक गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं। करीब 56 प्रतिशत स्कूलों में उचित फर्नीचर की कमी है, जिसके कारण कई छात्रों को बिना समुचित बैठने की व्यवस्था के पढ़ाई करनी पड़ती है।
हालाँकि कुछ क्षेत्रों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर भी पाई गई। रिपोर्ट में बताया गया कि केवल 1 प्रतिशत स्कूलों में मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) योजना के लिए रसोईघर की सुविधा नहीं है, जो इस योजना के बेहतर क्रियान्वयन का संकेत देता है। वहीं पुस्तकालय व्यवस्था भी अपेक्षाकृत मजबूत पाई गई और 70 प्रतिशत से अधिक स्कूल निर्धारित मानकों पर खरे उतरे।
शासन और प्रशासनिक व्यवस्था में भी कई कमियाँ दर्ज की गईं। लगभग एक-तिहाई स्कूलों में शिकायत और सुझाव पेटियाँ नहीं थीं, जो आरटीई ढांचे के तहत अनिवार्य मानी जाती हैं। इसके अलावा किसी भी स्कूल में पेशेवर काउंसलिंग सेवाएँ उपलब्ध नहीं थीं। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए सहायता प्रणाली भी अपर्याप्त पाई गई। साथ ही फील्ड स्तर के शिक्षा अधिकारियों द्वारा स्कूलों का नियमित निरीक्षण भी अपेक्षित मानकों के अनुसार नहीं किया जा रहा था।
शैक्षणिक और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों के क्रियान्वयन में भी कमी पाई गई। रिपोर्ट के अनुसार ‘वन नेशन, ग्रेट नेशन’ कार्यक्रम 69 प्रतिशत स्कूलों में लागू नहीं किया गया था, जिससे राष्ट्रीय एकीकरण और सह-शैक्षणिक गतिविधियों पर असर पड़ा।
सामाजिक अंकेक्षण का यह कार्य हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की टीम द्वारा रंधीर रंटा के नेतृत्व में किया गया। टीम ने कुल 704 स्कूलों में से 146 स्कूलों का मूल्यांकन किया, जो जिले के लगभग 20 प्रतिशत स्कूल हैं। शेष स्कूलों का आकलन चार आगामी चरणों में किया जाएगा।
रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए रंधीर रंटा ने कहा कि इस अभ्यास का उद्देश्य दोषारोपण नहीं बल्कि वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन करना है। उनके अनुसार सामाजिक अंकेक्षण का उद्देश्य दोष निकालना नहीं, बल्कि तथ्य सामने लाना है। रिपोर्ट में शिक्षा प्रणाली की कई चुनौतियाँ और कमियाँ उजागर हुई हैं, और कई स्कूलों का प्रदर्शन आरटीई अधिनियम के मानकों के अनुरूप नहीं है।
रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए हमीरपुर के शिक्षा गुणवत्ता उपनिदेशक नवीन शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए गंभीर है और रिपोर्ट में सामने आई कमियों को दूर किया जाएगा। उन्होंने कहा कि जिले का समग्र प्रदर्शन भले ही ठीक रहा हो, लेकिन सभी कमियों पर कार्यवाही की जाएगी।
सार्वजनिक सुनवाई के दौरान प्रश्नोत्तर सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने समस्याएँ रखीं और सुधार के सुझाव दिए। अभिभावकों और समुदाय के प्रतिनिधियों ने बुनियादी ढांचे में तत्काल सुधार, बेहतर निगरानी व्यवस्था, परिवहन सुविधाओं में सुधार और शिक्षा विभाग में अधिक जवाबदेही की माँग की।
यह रिपोर्ट आगे राज्य शिक्षा विभाग को भेजी जाएगी ताकि आवश्यक कदम उठाए जा सकें। विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि यदि इन प्रणालीगत कमियों को दूर नहीं किया गया, तो हर बच्चे को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का आरटीई का लक्ष्य कठिन बना रहेगा।
हमीरपुर जिले में सामाजिक अंकेक्षण के शेष चरणों से आने वाले समय में शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों का और अधिक व्यापक चित्र सामने आने की उम्मीद है।