शिलादित्य साहा
कई बार जंगल गए हैं लेकिन बाघ नहीं देख पाए? दुख मत कीजिए। बाघ को उन्होंने भी नहीं देखा। साल भर सर्दी, गर्मी, बरसात में जंगल में रहने के बावजूद पिछले साढ़े तीन वर्षों में एक बार भी बाघ के दर्शन नहीं हुए। वे हैं कुनो राष्ट्रीय उद्यान के चीते! अब शायद चीतों की किस्मत खुलने वाली है क्योंकि मध्य प्रदेश के इस संरक्षित वन के दरवाज़े पर एक बाघ आ पहुंचा है। बताया जा रहा है कि पड़ोसी राज्य राजस्थान के रणथंभौर टाइगर रिजर्व से साथी की तलाश में चलते-चलते यह नर बाघ आरटी 2512 कुनो पहुंचा है। वह प्रसिद्ध बाघिन सुल्ताना टी 107 का बेटा है। फिलहाल कुछ दिनों से जंगल सफारी के प्रमुख प्रवेश द्वार टिकटोली गेट के पास सूखी पत्तियों पर सर्दियों की धूप में लोटता हुआ देखा जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि 17 सितंबर 2022 को अफ्रीका के नामीबिया से लाकर जब 8 चीतों को कुनो के जंगल में छोड़ा गया था, तब इस संरक्षित वन में बाघ का न तो बसेरा था और न ही नियमित आवाजाही। बाद में दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते कुनो लाए गए। उसके बाद देश में जन्मे शावकों को मिलाकर शुक्रवार तक कुनो में 27 चीतों का निवास था। शनिवार सुबह मादा चीता आशा ने 5 शावकों को जन्म दिया, जिससे यह संख्या बढ़कर 32 हो गई लेकिन पिछले साढ़े तीन वर्षों में कुनो के जंगल के भीतर कभी बाघ नहीं आया इसलिए अफ्रीका से आए और भारत में जन्मे किसी भी चीते ने कभी बाघ नहीं देखा। अफ्रीका के खुले जंगलों में वैसे भी रॉयल बंगाल टाइगर नहीं पाए जाते। यानी अगर यह नर बाघ किसी तरह चीते के आमने-सामने आता है, तो भारत में पहली बार खाद्य श्रृंखला के शीर्ष दो शिकारी प्राणियों की आमने-सामने मुलाकात होगी।
मध्य प्रदेश के कुनो के 32 और गांधीसागर में मौजूद तीनों चीतों ने जैसे कभी बाघ नहीं देखा, वैसे ही बाघ भी खुले जंगल में चीते से कभी नहीं टकराया। हालांकि कई बार कुनो के चीते जंगल से निकलकर नदी और सड़क पार कर रणथंभौर के पास तक पहुंच गए थे। वे मध्य प्रदेश के माधव राष्ट्रीय उद्यान के आसपास भी देखे गए हैं, जिसे हाल ही में टाइगर रिजर्व का दर्जा मिला है लेकिन बाघ और चीते की चार आंखों की मुलाकात अब तक आधिकारिक रूप से नहीं हुई है।
इसी कारण वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए यह स्थिति अनोखी है। बाघ और चीता आमने-सामने होंगे तो वे एक-दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करेंगे, यह किसी को नहीं पता। कुनो के जंगल में तेंदुए भी हैं। कभी-कभार चीतों के साथ उनका तनाव देखा गया है लेकिन कुल मिलाकर दोनों एक-दूसरे से बचकर ही चलते हैं। शिकार को लेकर भी तेंदुए और चीते के बीच बड़े टकराव का उदाहरण नहीं है। बल्कि चीतों को कुनो के जंगल से बाहर ग्रामीण बस्तियों में भी आराम से घूमते देखा गया है। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े वरिष्ठ आरटीआई कार्यकर्ता अजय दुबे के अनुसार, कुनो के कितने ही चीते अभी खुले जंगल में हैं। फिलहाल इस बाघ से उन्हें किसी नुकसान की आशंका नहीं है।
लाभ-हानि बाद की बात है लेकिन वास्तविक स्थिति कुछ अलग है। कुनो के 27 चीतों में से कम से कम 13 खुले जंगल में घूम रहे हैं। अतीत में देखा गया है कि वे जंगल से निकलकर राजस्थान की दिशा में गए हैं, लगभग उसी रास्ते से, जिससे सुल्ताना का बेटा रणथंभौर से कुनो आया है। कुनो के मुख्य वन संरक्षक उत्तम शर्मा का कहना है कि यह पहली बार नहीं है। इससे पहले भी कई सर्दियों में एक नर बाघ संभवतः यही बाघ कुनो के बफर क्षेत्र में घूमता देखा गया है। उनके अनुसार, सर्दियों में बाघों की गतिविधि बढ़ जाती है। कुनो के आसपास कई टाइगर लैंडस्केप हैं इसलिए सफारी के दौरान आसपास बाघ दिख जाए तो आश्चर्य की बात नहीं। हालांकि अब तक बाघ और चीते की आमने-सामने भेंट नहीं देखी गई है। आमतौर पर बाघ यहां आता है और कुछ दिनों बाद लौट जाता है।
मध्य प्रदेश में वन्यजीवों पर काम करने वाले गौरव भारद्वाज का दावा है कि यह नर बाघ पिछले दिसंबर के अंत में ही कुनो के कोर क्षेत्र में प्रवेश कर चुका था। वह रणथंभौर से चंबल और पार्वती नदियां पार कर प्रस्तावित चीता कॉरिडोर से होते हुए यहां पहुंचा है। अतीत में राजस्थान में बाघ और चीते साथ पाए जाते थे लेकिन वह कम से कम आठ दशक पुरानी बात है। उस समय के एशियाई चीतों की नस्ल आज भारत में विलुप्त हो चुकी है। बाघ भी एक समय अंधाधुंध शिकार के कारण अपनी आनुवंशिक विविधता का बड़ा हिस्सा खो चुका है। ऐसे में यदि राजस्थान का रॉयल बंगाल टाइगर और मध्य प्रदेश में बसे अफ्रीकी चीतों की आमने-सामने मुलाकात होती है, तो वह एक ऐतिहासिक मिसाल होगी।