हल्दवानीः उत्तराखंड के हल्द्वानी में किसान सुखवंत सिंह की मौत अब सिर्फ एक आत्महत्या का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रशासनिक दबाव, पुलिस की भूमिका और सिस्टम की जवाबदेही पर बड़ा सवाल बनती जा रही है। पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरिश रावत ने इस मामले को “आत्महत्या नहीं, बल्कि परिस्थितियों द्वारा कराई गई हत्या” करार देते हुए SIT के बजाय CBI जांच की मांग की है।
हरिश रावत का कहना है कि सुखवंत सिंह ने खुद को गोली जरूर मारी, लेकिन वह फैसला उसकी अपनी मर्जी से नहीं था। उनके मुताबिक, जिन हालातों में उसे धकेला गया, वे उसे आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले थे। रावत ने मांग की कि सुखवंत सिंह को शहीद का दर्जा दिया जाए, क्योंकि यह मामला सिस्टम द्वारा उत्पीड़न का उदाहरण है।
सुखवंत सिंह ने मौत से पहले एक वीडियो और ईमेल के जरिए कई प्रॉपर्टी डीलरों और पुलिस अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए थे। कांग्रेस का दावा है कि अपने अंतिम बयान में उन्होंने साफ तौर पर उन लोगों के नाम बताए, जिन्होंने उन्हें परेशान किया, आर्थिक रूप से लूटा और उनके खिलाफ साजिश रची। इसी आधार पर कांग्रेस FIR दर्ज करने, दोषी अधिकारियों को तत्काल सस्पेंड करने और पूरे मामले की जांच CBI को सौंपने की मांग कर रही है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए पहले ही SIT का गठन कर दिया है। SIT ने उद्यम सिंह नगर जिले के आईटीआई थाने में जांच शुरू कर दी है।एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, एसआईटी की टीम केस डायरी, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मोबाइल फोन और अन्य सबूतों की जांच कर रही है। सुखवंत सिंह का मोबाइल फोन और हथियार फॉरेंसिक जांच के लिए FSL भेजे गए हैं। तकनीकी टीम उस ईमेल का भी विश्लेषण कर रही है, जिसमें पुलिस और स्थानीय लोगों पर आरोप लगाए गए थे।
सरकार की तरफ से यह संकेत भी दिए गए हैं कि मामले को हल्के में नहीं लिया जा रहा। पुलिस ने निष्पक्ष जांच के नाम पर 12 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड और ट्रांसफर किया है, जिनमें सब-इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी भी शामिल हैं। साथ ही, कुमाऊं मंडल के आयुक्त द्वारा मजिस्ट्रियल जांच भी चल रही है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पीड़ित परिवार को न्याय का भरोसा दिलाते हुए कहा है कि जांच में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सरकार का कहना है कि जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि असली सवाल जांच एजेंसी से ज़्यादा उस सिस्टम पर है, जिसने एक किसान को इस हद तक तोड़ दिया कि उसने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाते हुए अपनी जान दे दी। SIT बनाम CBI की बहस के बीच यह मामला किसानों की सुरक्षा, पुलिस जवाबदेही और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर एक बड़ा नैतिक और राजनीतिक प्रश्न बन चुका है।
सुखवंत सिंह की मौत अब सिर्फ़ एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं, बल्कि उस ढांचे की परीक्षा है, जो न्याय और सुरक्षा का दावा करता है। सवाल यही है-क्या यह जांच सिर्फ़ प्रक्रिया बनकर रह जाएगी, या सच में उन परिस्थितियों को उजागर करेगी जिन्हें हरिश रावत “हत्या” कह रहे हैं?