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आबकारी नीति मामला: सिसोदिया के वकील बोले-ईमेल, रिपोर्ट और सुझाव साझा करना अपराध कैसे?

CBI की ‘साउथ लॉबी’ थ्योरी पर बचाव पक्ष का पलटवार, पुराने ठेकेदारों के हित साधने का आरोप।

By श्वेता सिंह

Jan 17, 2026 00:26 IST

नयी दिल्लीः दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े CBI केस में शुक्रवार को राउज एवेन्यू कोर्ट में सुनवाई के दौरान पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की ओर से रखी गई दलीलों ने पूरे मामले की बुनियाद पर ही सवाल खड़े कर दिए। बचाव पक्ष का तर्क साफ था नीति निर्माण की प्रक्रिया को आपराधिक साजिश के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि इसमें कोई आपराधिक तत्व मौजूद नहीं है।

सिसोदिया की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन और वकील विवेक जैन ने अदालत में दलील दी कि एक्साइज पॉलिसी के लिए बनाई गई एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट साझा करना या उस पर सुझाव मांगना कोई अपराध नहीं हो सकता। यह रिपोर्ट पहले से ही आबकारी विभाग की वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थी। ऐसे में इसे कुछ व्यक्तियों को भेजे जाने को साजिश कहना कानूनन टिकाऊ नहीं है।

पुरानी नीति के समर्थक लॉबी बनाम नई नीति

बचाव पक्ष ने कोर्ट के सामने यह नैरेटिव भी रखा कि असल में ‘लॉबी’ नई नीति के पक्ष में नहीं, बल्कि पुरानी आबकारी नीति को बनाए रखने के लिए सक्रिय थी। वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि पहले की नीति में 60–70 प्रतिशत तक मुनाफा कुछ चुनिंदा समूहों को मिल रहा था और वही समूह नई नीति का विरोध कर रहे थे।

रेबेका जॉन ने कहा कि CBI जिस ‘साउथ लॉबी’ की बात कर रही है, उस पर तो जोर दिया जा रहा है, लेकिन उन लॉबी समूहों पर एजेंसी पूरी तरह खामोश है जो यथास्थिति बनाए रखना चाहते थे। यह चयनात्मक जांच के आरोप को भी मजबूत करता है।

ईमेल, व्हाट्सएप और मोबाइल: सबूतों की कमजोरी?

कोर्ट में यह भी बताया गया कि करीब 4600 ईमेल्स में से केवल छह ईमेल ज़ाकिर खान से जुड़े इंटर्न्स द्वारा भेजे गए थे, जिन्हें नीति निर्माण का आधार बताना अव्यावहारिक है। एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके अलावा 36 पन्नों के कथित प्रिंटआउट, व्हाट्सएप चैट्स और मोबाइल फोन से जुड़े आरोपों पर भी बचाव पक्ष ने सवाल उठाए—ना कोई फिजिकल रिकवरी, ना प्रिंट करने वाले का पता, और ना ही किसी अन्य आरोपी के फोन से सिसोदिया द्वारा भेजे गए संदेशों का कोई ट्रेल।

मोबाइल नष्ट करने के आरोप पर भी यह दलील दी गई कि अभियोजन खुद मानता है कि तीन फोन थे, जिनमें से एक रिकवर हुआ है। ऐसे में जानबूझकर सबूत मिटाने का आरोप कमजोर पड़ता है।

कानूनी बहस से आगे राजनीतिक असर

यह मामला अब सिर्फ कानूनी दायरे में सीमित नहीं रहा है। एक ओर जहां CBI आरोप तय कराने की दिशा में आगे बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर सिसोदिया का बचाव इसे नीति सुधार बनाम स्टेटस-क्वो लॉबी की लड़ाई के रूप में पेश कर रहा है। आने वाले दिनों में जब अदालत अरविंद केजरीवाल के खिलाफ आरोपों पर भी सुनवाई करेगी, तब यह केस और ज्यादा राजनीतिक और संवैधानिक बहस का केंद्र बन सकता है।

फिलहाल, अदालत में रोज़ाना आधार पर दलीलें सुनी जा रही हैं। यह देखना अहम होगा कि कोर्ट इन तर्कों को किस हद तक स्वीकार करता है और क्या यह मामला नीति निर्माण की प्रक्रिया की न्यायिक व्याख्या के लिए एक मिसाल बनेगा।

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