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1930 की दुर्लभ ‘साकी’ पेंटिंग नीलामी में, कीमत 2 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान

‘अष्टगुरु’ नीलामी घर में 22–23 जून को लॉट नंबर फाइव के रूप में शामिल होगी पेंटिंग

मुंबई : वर्ष 1930–1931 के आसपास हेमेन मजूमदार द्वारा चित्रित यह कलाकृति अब नीलामी में कम से कम 2 करोड़ रुपये में बिकने की उम्मीद है। इस चित्र की नीलामी में ‘बेस प्राइस’ 1 करोड़ 25 लाख रुपये रखा गया है अर्थात बोली की शुरुआत इसी राशि से होगी।

यह चित्र किसका है और किसने बनाया है? हल्के गहरे पृष्ठभूमि में एक ही पात्र दिखाई देता है। एक युवा महिला प्याले में शराब डालती हुई दिख रही है। इस चित्र का नाम ‘साकी’ है। प्रख्यात बंगाली कलाकार हेमेन मजूमदार द्वारा लगभग 1930–1931 के दौरान बनाई गई यह पेंटिंग जून की 22 या 23 तारीख को मुंबई स्थित प्रसिद्ध नीलामीघर ‘अष्टगुरु’ की नीलामी में रखी जाएगी। नीलामी सूची में इस चित्र का कोड ‘लॉट नंबर फाइव’ है। यह चित्र 20 इंच लंबा और 14.7 इंच चौड़ा है तथा इसे बोर्ड पर ऑयल पेंट से बनाया गया है।

‘अष्टगुरु’ ऑक्शन हाउस का अनुमान है कि यह चित्र कम से कम 2 करोड़ रुपये में बिकेगा। इससे पहले भारतीय नीलामी घरों में हेमेन मजूमदार की पेंटिंग्स के लिए दो बार इससे अधिक कीमत मिल चुकी है। 1928 में बनी एक अनटाइटल्ड पेंटिंग मुंबई की ही एक नीलामी में 5 करोड़ 4 लाख रुपये में बिकी थी। ‘राधा और कृष्ण’ नामक पेंटिंग 3 करोड़ 70 लाख रुपये में बेची गई थी।

‘साकी’ को लेकर कला प्रेमियों में खासा उत्साह देखा जा रहा है। कला इतिहासकार और हेमेन मजूमदार के परिवार की सदस्य अनुराधा घोष ने इस पेंटिंग के बारे में ‘इस समय’ से बातचीत में कहा कि 1930 के दशक की शुरुआत में कश्मीर के महाराजा के आमंत्रण पर कलाकार ने वहां कुछ महीने बिताए थे और उसी दौरान यह चित्र बनाया गया।

अनुराधा घोष ने बताया कि हेमेन मजूमदार को अधिकतर लोग हेमेन मजूमदार नाम से ही जानते थे। उनकी ‘सिक्तवसना सुंदरि’ श्रृंखला की पेंटिंग्स उस समय एक प्रकार के विद्रोह का प्रतीक बन गई थीं। यह विद्रोह अवनींद्रनाथ ठाकुर के नेतृत्व में विकसित ‘नव-बंगाल स्कूल’ के विरुद्ध माना जाता है।

अनुराधा घोष ने आगे कहा कि 1919 में हेमेन मजूमदार, अतुल बोस और जमिनी राय जैसे कलाकारों ने ‘इंडियन एकेडमी ऑफ आर्ट’ की स्थापना की थी। उनकी पेंटिंग्स में प्रकाश-छाया का प्रयोग, कपड़ों की तहों की प्रस्तुति और चित्रण शैली पर यूरोपीय कलाकारों का गहरा प्रभाव देखा जाता है। स्नान के बाद गीले कपड़े पहने बंगाली महिलाओं के चित्रों में उनकी ब्रश स्ट्रोक, रंगों का उपयोग और टोनल प्रभाव आज भी दर्शकों को आकर्षित करता है।

एक अन्य कला इतिहासकार सुसोभन अधिकारी ने कहा कि ‘साकी’ पेंटिंग में प्रकाश और छाया का अद्भुत प्रयोग अत्यंत कुशलता से किया गया है। उनके अनुसार इस चित्र में डच स्वर्ण युग के प्रसिद्ध कलाकार रेम्ब्रांट का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

सुसोभन अधिकारी ने कहा कि स्वदेशी आंदोलन और उसके प्रभाव के चरम समय में यूरोपीय शैली में चित्रण करने के कारण हेमेन मजूमदार की आलोचना भी हुई थी, लेकिन उनकी शैली अंततः अस्वीकार नहीं हुई। पिछले वर्षों में उनकी पेंटिंग्स का ऊँचे दामों पर बिकना और अब ‘साकी’ का 1.25 करोड़ रुपये से नीलामी शुरू होना यह दर्शाता है कि उनकी कला शैली की स्वीकार्यता कितनी मजबूत है। यह पेंटिंग पहले दिल्ली के व्यवसायी शोभा सिंह के निजी संग्रह में थी। बाद में विभिन्न हाथों से गुजरते हुए यह वर्तमान संग्रहकर्ताओं तक पहुँची है।

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