नयी दिल्लीः अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा झटका लगा है। उनके टैरिफ को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ‘गैरकानूनी’ घोषित कर दिया है। इसके चलते आपात आधार पर लगाए गए अतिरिक्त टैरिफ और रेसिप्रोकल टैरिफ फिलहाल रद्द हो गए हैं। फैसले के 24 घंटे के भीतर ही केंद्र सरकार के वाणिज्य मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है कि इस निर्णय के संभावित प्रभावों की समीक्षा की जा रही है।
ट्रंप ने भारतीय उत्पादों पर दो चरणों में 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया था। बाद में द्विपक्षीय व्यापार समझौते की शर्तों के तहत यह घटकर 18 प्रतिशत हो गया। लेकिन शुक्रवार को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ को ‘पूरी तरह गैरकानूनी’ करार दिया। इसके बाद आपातकालीन अतिरिक्त टैरिफ और रेसिप्रोकल टैरिफ दोनों ही अस्थायी रूप से समाप्त हो गए।
हालांकि ट्रंप ने इसके जवाब में विदेशी वस्तुओं पर नया 10 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया है। यह 24 फरवरी की मध्यरात्रि से लागू होगा और 150 दिनों तक प्रभावी रहेगा। यह कदम 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 के तहत उठाया गया है, जिसके अनुसार व्यापार घाटा या आयात से अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ने की स्थिति में अस्थायी टैरिफ लगाया जा सकता है। व्यापार विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय उत्पादों पर भी फिलहाल 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लागू होगा।
इस बीच केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय ने संक्षिप्त बयान में कहा, “अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के टैरिफ संबंधी फैसले को हमने देखा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रेस वार्ता भी की है। ट्रंप प्रशासन की ओर से कुछ कदमों की घोषणा की गई है। इनके संभावित प्रभावों की समीक्षा की जा रही है।”
गौरतलब है कि ट्रंप ने राष्ट्रीय आपातकालीन कानून के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए टैरिफ लगाए थे। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स ने कहा कि टैरिफ लगाने के मामले में राष्ट्रपति अपनी अधिकार-सीमा से आगे बढ़ गए। नौ न्यायाधीशों की पीठ में से छह ने टैरिफ को गैरकानूनी बताया, जबकि तीन न्यायाधीश इसके पक्ष में थे।
टैरिफ के खिलाफ पहले व्यापारियों और 12 डेमोक्रेट-शासित राज्यों के गवर्नरों ने निचली अदालत में याचिका दायर की थी। निचली अदालत ने भी माना था कि ट्रंप ने आपात आर्थिक शक्तियों का उपयोग करते हुए अपनी अधिकार-सीमा पार कर दी और टैरिफ को गैरकानूनी ठहराया। फेडरल सर्किट की अपील अदालत ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद ट्रंप प्रशासन ने इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन वहां भी उसे झटका लगा।