नई दिल्ली: लोकसभा में सोमवार को पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब को लेकर बड़ा हंगामा मचा। विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा इसका हवाला देने के बाद बुधवार को कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री डर गए, इसलिए संसद में उपस्थित नहीं हुए, जबकि केंद्रीय रेल मंत्री और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने “बुलेट ट्रेन की तरह भागना” चुना।
प्रियंका गांधी ने आरोप लगाया कि BJP-नेतृत्व वाली सरकार संसद की कार्यवाही में व्यवधान डाल रही है और स्पीकर का सम्मान नहीं कर रही। उनका कहना था कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सिर्फ एक व्यक्ति नहीं होता, वह पूरे विपक्ष का प्रतिनिधित्व करता है और सरकार द्वारा उनके बोलने पर रोक लगाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अपमान है।
उन्होंने कहा, “निशिकांत जी केवल तब हाउस में लाए जाते हैं जब सरकार व्यवधान पैदा करना चाहती है। सरकार किसी सदस्य को प्रकाशित किताब से उद्धरण देने नहीं देती, लेकिन वह 6 किताबें लेकर आते हैं। यह दिखाने के लिए कि केवल उनकी इच्छा चलेगी। यह स्पीकर और संसद का अपमान है।”
प्रियंका गांधी ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके समय में निर्णय लेने से पीछे नहीं हटा जाता था। उनका तर्क है कि आज की कार्रवाई लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष को बोलने से रोका गया।
विपक्ष ने यह भी उठाया कि नरवणे की अप्रकाशित किताब में चीन के साथ सीमा तनाव और देश की नेतृत्व शैली को लेकर महत्वपूर्ण तथ्य हैं, जो सार्वजनिक होने चाहिए। राहुल गांधी ने कहा कि यह किताब विदेश में प्रकाशित हो चुकी है, जबकि भारत में इसे रोकना सरकार की सेंसरशिप नीति का हिस्सा है।
विश्लेषकों के अनुसार यह विवाद सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है। यह संसद और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, विपक्ष की भूमिका और सैन्य नीतियों की पारदर्शिता जैसे बड़े सवाल उठाता है। सरकार का रुख यह दिखाता है कि वह सूचना प्रवाह को नियंत्रित कर विपक्ष की आवाज को सीमित करना चाहती है।
प्रियंका गांधी और राहुल गांधी का यह कदम बताता है कि विपक्ष लोकतांत्रिक अधिकारों और संसद की गरिमा को लेकर सचेत है। सरकार की इस नीति से संसदीय टकराव और बढ़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो संसद में विपक्ष और सरकार के बीच टकराव और तीव्र होगा जिससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की छवि पर असर पड़ सकता है।