नयी दिल्लीः क्या दुनिया एक बार फिर किसी महाविनाश की ओर बढ़ रही है? कोविड की चोटें अभी पूरी तरह भरी भी नहीं हैं और इसी बीच दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित और प्राचीन मेडिकल जर्नल The Lancet के एडिटर-इन-चीफ डॉ. रिचर्ड हॉर्टन ने रोंगटे खड़े कर देने वाली चेतावनी दी है। उनके अनुसार अगले 20 वर्षों के भीतर एक और महामारी आना “लगभग तय” है और इसके लिए जिम्मेदार होगी मानव जाति की अदूरदर्शिता।
इतना ही नहीं, उन्होंने भारत में कोविड से हुई मौतों के सरकारी आंकड़ों पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि सरकारी आंकड़ों और वास्तविक संख्या के बीच ज़मीन-आसमान का अंतर है।
महामारी क्यों लगभग तय है?
डॉ. हॉर्टन के अनुसार जिस तरह इंसान पर्यावरण को नष्ट कर रहा है, जंगलों की अंधाधुंध कटाई कर रहा है और इसके चलते लगातार वन्य जीवों के संपर्क में आ रहा है-उससे नए वायरस का उभरना बस समय की बात है।
उन्होंने कहा कि अव्यवस्थित शहरीकरण और अनियंत्रित रूप से चल रहे बूचड़खाने अगली महामारी की जन्मस्थली बन सकते हैं। गंदे माहौल में पशुपालन और खुले बाजारों में मांस की बिक्री-ये सभी परिस्थितियाँ वायरस के म्यूटेशन यानी रूपांतरण के लिए आदर्श हैं।
अगर कोई वायरस एक बार ज़ूनोटिक ट्रांसमिशन के ज़रिए जानवरों से इंसानों में फैल गया और फिर मानव श्वसन तंत्र के माध्यम से संक्रमण फैलाने लगा, तो वह पूरी मानव जाति के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।
भारत में कोविड मौतें: ‘कहानी’ बनाम हकीकत
India Today को दिए एक साक्षात्कार में हॉर्टन ने भारत के कोविड मृत्यु आंकड़ों को लेकर विस्फोटक टिप्पणी की। भारत सरकार के अनुसार कोविड से देश में लगभग 5 लाख लोगों की मौत हुई थी।
लैंसेट के संपादक ने इस आंकड़े को ‘फैन्टास्टिकल’ यानी “काल्पनिक” और “असत्य” करार दिया। उनके मुताबिक, World Health Organization (WHO) और लैंसेट के स्वतंत्र अध्ययनों में पूरी तरह अलग तस्वीर सामने आई है।
इन मॉडलों के अनुसार, भारत में कोविड से वास्तविक मौतों की संख्या 40 से 47 लाख के बीच हो सकती है। हॉर्टन ने चेतावनी दी-“अगर हम अपनी गलतियाँ स्वीकार नहीं करेंगे तो उनसे सीख भी नहीं पाएंगे। यदि भारत अपनी नाकामियों और मौतों के सही आंकड़ों को छिपाता रहा तो अगली महामारी में लाखों लोग बेवजह अपनी जान गंवा देंगे।”
उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिटेन ने भी कोविड काल में गलतियाँ की थीं, लेकिन उसने उन्हें स्वीकार किया। उनके अनुसार पारदर्शी जांच के बिना किसी महामारी से निपटने की तैयारी असंभव है।
पर्यावरण संरक्षण और अतीत की गलतियों को स्वीकार करना-इन दोनों मोर्चों पर बदलाव नहीं हुआ तो आने वाले समय में इस बड़े खतरे को टाल पाना लगभग नामुमकिन होगा, ऐसा विशेषज्ञों का मानना है।