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दिल्ली की हवा: साल भर जहर, नए साल पर ‘सबसे साफ’ होने का दावा! AQI ने खोली असली तस्वीर

सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है प्रदूषण हर साल की समस्या, दीर्घकालिक योजना जरूरी। सीपीसीबी आंकड़े दिखा रहे गंभीर प्रदूषण, वाहनों और औद्योगिक गतिविधियों से बढ़ रहा जोखिम।

By श्वेता सिंह

Jan 01, 2026 22:41 IST

नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में वायु गुणवत्ता की स्थिति लगातार गंभीर बनी हुई है। पूरे साल दिल्लीवासियों को जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर होना पड़ा। दिसंबर 2025 में राजधानी का औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 349 दर्ज किया गया, जो पिछले सात वर्षों में सबसे खराब स्तर माना जा रहा है। इस दौरान पीएम2.5 प्रदूषण में पराली जलाने का योगदान महज 3.5 प्रतिशत रहा, जिससे यह साफ होता है कि प्रदूषण के पीछे अन्य कारण ज्यादा प्रभावी हैं।

इसी बीच नए साल के पहले ही दिन दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मंजींदर सिंह सिस्सा के बयान ने नई बहस छेड़ दी। मंत्री ने दावा किया कि 2025 में दिल्ली की हवा पिछले आठ वर्षों में सबसे साफ रही। उनके मुताबिक, पीएम2.5 का स्तर 104 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से घटकर 96 और पीएम10 का स्तर 212 से घटकर 197 हो गया। मंत्री ने कहा कि साफ हवा सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता रही और विज्ञान-आधारित उपायों के कारण 2025 में अच्छे AQI वाले दिनों की संख्या बढ़ी।

CPCB के आंकड़े बयान से उलट

हालांकि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़े मंत्री के दावे से मेल नहीं खाते। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2018 में दिल्ली का औसत AQI 360 दर्ज किया गया था। इसके बाद दिसंबर 2024 में यह 294, 2023 में 348, 2022 में 319, 2021 में 336, 2020 में 332 और 2019 में 337 रहा। ये आंकड़े बताते हैं कि हर साल सर्दियों के महीनों में दिल्ली की हवा गंभीर रूप से खराब होती रही है।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

वायु प्रदूषण के मुद्दे पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ कहा कि यह केवल तात्कालिक समस्या नहीं, बल्कि हर साल दोहराई जाने वाली गंभीर चुनौती बन चुकी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) को दीर्घकालिक और ठोस योजना पेश करने का निर्देश दिया। अदालत ने शहरी परिवहन, औद्योगिक प्रदूषण और पराली जलाने जैसे मुद्दों पर स्थायी समाधान की जरूरत पर जोर दिया।

पराली नहीं, दूसरे स्रोत ज्यादा जिम्मेदार

पर्यावरणविद अमित गुप्ता की ओर से दायर RTI के जवाब में CPCB ने बताया कि पांच दिसंबर तक दिल्ली में पीएम2.5 प्रदूषण में पराली जलाने का योगदान सिर्फ 3.5 प्रतिशत था। इसके बावजूद दिल्ली-एनसीआर देश के सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में बना हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि वाहनों का धुआं, औद्योगिक इकाइयां, पावर प्लांट, सड़क की धूल और निर्माण कार्य प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं।

दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी में दिल्ली

स्विट्जरलैंड स्थित एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग ग्रुप ‘IQAir’ भी दिल्ली को दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी बता चुका है। एयर क्वालिटी इंडेक्स 0 से 500 के बीच होता है, जिसमें 0–50 को अच्छा और 150 से ऊपर को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाता है। दिल्ली में यह समस्या पिछले कई वर्षों से बनी हुई है और हर सर्दी में हालात और बिगड़ जाते हैं।

सरकारी कदम और नई रणनीति

प्रदूषण पर काबू पाने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं, हालांकि नतीजे अभी संतोषजनक नहीं दिखते। वाहनों और औद्योगिक इकाइयों पर निगरानी बढ़ाई गई है। सड़क की धूल कम करने के लिए मैकेनाइज्ड स्वीपिंग और मिस्ट स्प्रेयर लगाए गए हैं। निर्माण स्थलों पर सख्ती, नियम उल्लंघन पर चालान और कचरा प्रबंधन को तेज करने जैसे उपाय किए जा रहे हैं।

लगातार खराब होती हवा को देखते हुए CAQM ने ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) में भी बदलाव किए हैं। अब पहले चरण चार में लागू होने वाले कुछ कड़े कदम चरण तीन में ही लागू किए जा रहे हैं। इसके तहत सार्वजनिक और निजी कार्यालयों में आधे कर्मचारियों के साथ काम करने की व्यवस्था की गई है, ताकि वाहनों की संख्या घटे और प्रदूषण पर नियंत्रण पाया जा सके।

CAQM का कहना है कि आगे GRAP के सख्त पालन, नई तकनीकों के पायलट प्रोजेक्ट और नागरिक सहभागिता बढ़ाकर दिल्ली की हवा में सुधार को लंबे समय तक बनाए रखने की कोशिश की जाएगी। लेकिन मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि दावों और जमीनी सच्चाई के बीच की खाई अभी भी बड़ी बनी हुई है।

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