नयी दिल्लीः चुनाव चिन्ह पाने का अधिकार मौलिक नहीं, बल्कि कानून आधारित। दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 की संवैधानिक वैधता को बनाए रखा। अदालत ने हिंद साम्राज्य पार्टी द्वारा दायर याचिका खारिज कर दी। इस याचिका में राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर मान्यता देने और चुनाव चिन्ह आवंटित करने में चुनाव आयोग (EC) के अधिकार को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों की पहचान करने और चुनाव चिन्ह आवंटित करने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार है।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि मान्यता प्राप्त और गैर-मान्यता प्राप्त दलों के बीच का अंतर संविधान के अनुरूप है और यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करता। चुनाव चिन्ह प्राप्त करना मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि Representation of the People Act, 1951 और संबंधित नियमों के तहत एक विधिक अधिकार है। केवल इस आधार पर कि कोई दल मान्यता प्राप्त नहीं है, वह मान्यता प्राप्त दलों के समान सुविधाओं का दावा नहीं कर सकता।
डिवीजन बेंच, न्यायमूर्ति नितिन वासुदेव सांबरे और न्यायमूर्ति अनिश दयाल की अध्यक्षता में याचिका में उठाए गए विभिन्न प्रावधानों जैसे कि पैरा 5(2), 6A, 6B और 6C को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि चुनाव चिन्ह आदेश एक "निर्देशों का संकलन" है, जिसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए जारी किया गया है और यह अनुच्छेद 324 के तहत आता है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव आयोग (EC) को चुनाव चिन्ह आवंटन और राजनीतिक दलों की मान्यता देने में स्वतंत्रता है। यह अधिकार केंद्रीय सरकार द्वारा बनाई गई नियमावली से अलग है और इसे किसी भी राजनीतिक दबाव के बिना लागू किया जा सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि मान्यता प्राप्त दलों को मिलने वाले विशेषाधिकार जैसे कि सुरक्षित चिन्ह, मतदाता सूची तक पहुंच और अन्य सुविधाएं पिछली चुनावी उपलब्धियों और वस्तुनिष्ठ मापदंडों पर आधारित हैं। यह वर्गीकरण वैध और उचित है और इससे नए पंजीकृत या गैर-मान्यता प्राप्त दलों के साथ भेदभाव नहीं होता।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए मुद्दों को पहले सुप्रीम कोर्ट में सुलझा हुआ माना और कहा कि यह याचिका केवल पहले से तय मामलों को फिर से उठाने का प्रयास है। इसलिए याचिका खारिज कर दी गई और चुनाव आयोग और केंद्रीय सरकार को Representation of the People Act, 1951 और चुनाव चिन्ह आदेश, 1968 लागू करने से रोकने का कोई निर्देश नहीं दिया गया।
इस फैसले से चुनाव आयोग की राजनीतिक दलों की मान्यता और चुनाव चिन्ह आवंटन में स्वतंत्रता को मजबूती मिली है। अब यह स्पष्ट हो गया है कि चुनाव प्रक्रिया में आयोग के निर्देश संविधान द्वारा समर्थित हैं और इसमें कोई राजनीतिक हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है।