एडिनबर्गः हम जानते हैं कि इंसानों द्वारा मांस की खपत कम करने से खेती से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटते हैं। लेकिन सवाल यह है कि हमारे पालतू कुत्तों का भोजन पर्यावरण को कितना नुकसान पहुँचाता है? एक नए शोध से पता चलता है कि कई मामलों में कुत्तों को खिलाया जाने वाला भोजन, उनके मालिकों के खाने की तुलना में पर्यावरण के लिए ज़्यादा हानिकारक हो सकता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडिनबर्ग के जॉन हार्वे, यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडिनबर्ग के पीटर अलेक्ज़ेंडर और यूनिवर्सिटी ऑफ़ एक्सेटर की सारा क्रॉली के एक नए शोध में कहा गया है कि लगभग 20 किलोग्राम वज़न वाले कोली या इंग्लिश स्प्रिंगर स्पैनियल जैसे कुत्तों के लिए जाँचे गए डॉग फूड में से 40% का जलवायु पर प्रभाव, एक मानव शाकाहारी आहार से भी अधिक पाया गया। इतना ही नहीं 10% डॉग फूड का असर उस मानव आहार से भी ज़्यादा था जिसमें मांस की खपत बहुत अधिक होती है।
डॉग फूड आज वैश्विक खाद्य प्रणाली का एक बड़ा हिस्सा बन चुका है। अनुसार है कि केवल डॉग फूड की सामग्री तैयार करने से ही ब्रिटेन के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 0.9 से 1.3 प्रतिशत हिस्सा उत्पन्न होता है। अगर दुनिया भर के सभी कुत्तों के लिए भोजन उत्पादन को देखा जाए तो उससे होने वाला उत्सर्जन व्यावसायिक विमानों में जेट ईंधन जलाने से होने वाले उत्सर्जन के 59 से 99 प्रतिशत के बराबर हो सकता है।
Pet food यानी पालतू भोजन बनाने में जिस तरह के पशु उत्पाद इस्तेमाल होते हैं उसका पर्यावरण पर बहुत असर पड़ता है। डॉग फूड में कभी उच्च गुणवत्ता वाले मांस के टुकड़े जैसे चिकन ब्रेस्ट या बीफ़ का कीमा इस्तेमाल होते हैं और कभी पशु के वे हिस्से, जिन्हें आम तौर पर इंसान नहीं खाते-जैसे आंतरिक अंग या कटाई के बाद बचा मांस।
चिकन ब्रेस्ट जैसे “प्राइम कट” वही हिस्से हैं जिन्हें लोग भी खाते हैं और जिनसे पशु के पूरे शव की बिक्री से होने वाली आय का लगभग 93–98 प्रतिशत हिस्सा मिलता है। इसके विपरीत ऑफ़ल और ट्रिमिंग्स सस्ते होते हैं, मानव उपभोग में कम पसंद किए जाते हैं, लेकिन पोषण से भरपूर होते हैं और पालतू भोजन में व्यापक रूप से इस्तेमाल किए जाते हैं।
कुछ पुराने अध्ययनों में गलती यह हुई कि उप-उत्पादों को भी उतना ही पर्यावरणीय नुकसानदेह मान लिया गया जितना सबसे महंगे मांस को। इससे पशुधन के प्रभाव की दोहरी गणना हो गई और पालतू भोजन के पर्यावरणीय नुकसान का अनुमान वास्तविकता से कहीं ज़्यादा निकल आया।
एक बड़ी दिक्कत यह है कि पालतू भोजन के पैकेट पर यह साफ़ नहीं लिखा होता कि जानवर के कौन-से हिस्से इस्तेमाल किए गए हैं। “मांस और पशु-व्युत्पन्न” जैसे शब्द बहुत अस्पष्ट होते हैं। इससे कंपनियों को नुस्ख़े बदलने की आज़ादी मिलती है लेकिन उपभोक्ताओं के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि भोजन में असल में क्या है।
अगर पैकेट पर यह साफ़ लिखा हो कि भोजन में प्राइम मांस और उप-उत्पादों का अनुपात क्या है, तो पालतू जानवरों के मालिक बेहतर निर्णय ले सकेंगे और “पर्यावरण के अनुकूल” होने के दावों की ठीक से जाँच भी हो सकेगी।
भोजन का प्रकार भी पर्यावरणीय प्रभाव को बदल देता है। कई लोग कच्चे या अनाज-रहित यानी ग्रेन-फ्री आहार को ज़्यादा प्राकृतिक मानते हैं, लेकिन कई कुत्तों के लिए ये आहार न तो ज़रूरी होते हैं और न ही फ़ायदेमंद। उलटे इनमें पोषण असंतुलन और बैक्टीरिया से जुड़ा जोखिम हो सकता है, जो कुत्तों और उनके मालिकों- दोनों के लिए ख़तरनाक हो सकता है।
शोध बताते हैं कि सही ढंग से तैयार किया गया पौध-आधारित आहार कुत्तों की पोषण ज़रूरतें पूरी कर सकता है और इसके स्वास्थ्य परिणाम मांस-आधारित आहार जैसे ही हो सकते हैं। पशु-चिकित्सकों में भी इस सोच को लेकर स्वीकार्यता बढ़ रही है।
औसतन देखा जाए तो गीला भोजन- डिब्बाबंद या फ़ॉइल ट्रे में पैक)और कच्चा भोजन, सूखे किबल की तुलना में पर्यावरण को ज़्यादा नुकसान पहुँचाता है। ग्रेन-फ्री भोजन का पर्यावरणीय प्रभाव भी आम भोजन से अधिक पाया गया। कुछ पौध-आधारित भोजन थोड़े कम नुकसानदेह ज़रूर थे, लेकिन यह अंतर गीले/कच्चे और सूखे भोजन के बीच के अंतर के सामने काफ़ी छोटा था।
हालाँकि अपवाद भी मिले। कुछ गीले भोजन ऐसे थे जिनका उत्सर्जन सामान्य सूखे भोजन से भी कम था। सबसे कम नुकसानदेह भोजन में अक्सर मांस के उप-उत्पाद शामिल थे।
कीट-आधारित प्रोटीन जैसे नए विकल्पों को भी पर्यावरण के अनुकूल बताया जा रहा है। गीले और कच्चे भोजन में पैकेजिंग, ठंडा रखने और परिवहन के कारण भी अतिरिक्त उत्सर्जन होता है, जिससे ये और कम पर्यावरण-अनुकूल बन जाते हैं।
अध्ययन बताता है कि यह मामला केवल शाकाहारी बनाम कच्चे मांस का नहीं है। “सूखा भोजन हमेशा बेहतर होता है” जैसे आसान नियम हर बार सही नहीं होते। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि भोजन के भीतर क्या सामग्री है। जो लोग अपने पालतू जानवरों के भोजन का पर्यावरणीय असर कम करना चाहते हैं, उनके लिए यह समझना ज़रूरी है कि गीला, कच्चा और ग्रेन-फ्री भोजन अक्सर सूखे किबल से ज़्यादा नुकसानदेह हो सकता है। साथ ही ऐसा भोजन चुनना बेहतर है जिसमें उप-उत्पाद या पौध-आधारित प्रोटीन हों, न कि वही मांस जो इंसानों की थाली के लिए इस्तेमाल होता है।
डॉग फूड के पर्यावरणीय प्रभाव में 65 गुना से ज़्यादा का अंतर पाया गया- जबकि इंसानों के शाकाहारी और अधिक-मांस वाले आहारों के बीच यह अंतर केवल ढाई गुना था। इसका मतलब है कि कुत्तों के आहार में बदलाव करके पर्यावरण को होने वाले नुकसान को काफ़ी हद तक घटाया या बढ़ाया जा सकता है।