नयी दिल्लीः संसद का आगामी बजट सत्र सरकार के लिए आर्थिक एजेंडे को आगे बढ़ाने और विपक्ष के लिए नीतियों पर सवाल उठाने का अहम मंच साबित होने जा रहा है। संभावित कार्यक्रम के अनुसार सत्र की शुरुआत 28 जनवरी को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के संयुक्त सत्र में अभिभाषण से होगी। राष्ट्रपति का यह संबोधन न केवल संवैधानिक औपचारिकता है, बल्कि इसके जरिए सरकार अपनी नीतिगत प्राथमिकताओं और आने वाले वर्ष की दिशा स्पष्ट करती है। इसके बाद इसी अभिभाषण पर संसद में धन्यवाद प्रस्ताव के जरिए राजनीतिक बहस की शुरुआत होती है।
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, बजट सत्र के शुरुआती चरण में कार्यवाही अपेक्षाकृत सीमित रहेगी। 29 जनवरी को बीटिंग द रिट्रीट समारोह के कारण संसद नहीं चलेगी, जबकि 30 जनवरी को आर्थिक सर्वे पेश किए जाने की संभावना है। आर्थिक सर्वे को बजट का पूर्वाभ्यास माना जाता है, क्योंकि इसमें देश की आर्थिक स्थिति, विकास दर, महंगाई, रोजगार और राजकोषीय संतुलन पर सरकार का आकलन सामने आता है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि बजट में किन क्षेत्रों पर सरकार का विशेष फोकस रहने वाला है।
31 जनवरी को दोनों सदनों की बैठक नहीं होगी और इसके अगले दिन 1 फरवरी को केंद्रीय बजट पेश किया जाना प्रस्तावित है। रविवार के दिन बजट पेश होना असामान्य जरूर है, लेकिन इससे सरकार यह संदेश देना चाहती है कि बजट प्रक्रिया में समय और कार्यसूची को लेकर लचीलापन रखा जा रहा है। बजट के बाद संसद में सरकार की आर्थिक नीतियों पर विस्तृत चर्चा होगी, जिसमें राजस्व, खर्च, सामाजिक कल्याण योजनाओं और बुनियादी ढांचे पर निवेश जैसे मुद्दे केंद्र में रहेंगे।
बजट और राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के बाद संसद 13 फरवरी को लगभग एक महीने के अवकाश पर चली जाएगी। यह अवकाश केवल औपचारिक नहीं, बल्कि संसदीय कामकाज का महत्वपूर्ण चरण होता है, क्योंकि इसी दौरान विभागीय स्थायी समितियां विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान मांगों की समीक्षा करती हैं। इन समितियों की रिपोर्टें सरकार के खर्च पर संसदीय निगरानी को मजबूत करती हैं।
सत्र का दूसरा चरण 9 मार्च से शुरू होकर 2 अप्रैल को समाप्त होने की संभावना है। गुड फ्राइडे और उसके बाद के अवकाश को देखते हुए सत्र का समापन एक दिन पहले किए जाने की योजना है। कुल मिलाकर, यह बजट सत्र आर्थिक नीतियों, राजनीतिक विमर्श और संसदीय जवाबदेही-तीनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसमें सरकार के लिए विकास और वित्तीय संतुलन के बीच संतुलन साधना सबसे बड़ी चुनौती होगी।