बेंगलुरुः देश की न्याय व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी को मजबूत बनाने पर जोर देते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि अब समय आ गया है जब समान अवसरों को व्यवहार में लागू किया जाए। उन्होंने यह बात आज बेंगलुरु में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान कही।
यह सम्मेलन सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित किया गया था, जहाँ न्यायपालिका और विधि क्षेत्र से जुड़े कई विशेषज्ञ मौजूद थे। इस अवसर पर उन्होंने सुझाव दिया कि सरकारी वकीलों और विधिक सहायता पैनलों में महिलाओं की भागीदारी कम से कम 50 प्रतिशत होनी चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि केवल कागज़ों पर समानता की बात करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे वास्तविक जीवन में लागू करना आवश्यक है। उन्होंने उन चुनौतियों का भी उल्लेख किया, जिनका सामना महिला वकीलों को करना पड़ता है, जैसे अनियमित कार्य समय, मुवक्किलों का कम भरोसा और शुरुआती दौर में आर्थिक अस्थिरता।
उनका मानना है कि यदि महिलाओं को सरकारी मामलों और कानूनी सहायता में पर्याप्त अवसर मिलेंगे, तो इससे उन्हें अनुभव और आर्थिक स्थिरता दोनों प्राप्त होंगे, जिससे वे अपने करियर को बेहतर ढंग से आगे बढ़ा सकेंगी।
उन्होंने न्यायपालिका में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को सकारात्मक संकेत बताया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि पूर्ण समानता हासिल करने के लिए अभी और प्रयासों की आवश्यकता है। उन्होंने सरकार से महिला वकीलों के लिए एक विशेष आर्थिक सहायता कोष बनाने की अपील की ताकि वे अपने करियर के शुरुआती चरणों या मातृत्व अवकाश के दौरान आर्थिक दबाव से बच सकें।
कार्यस्थल की सुविधाओं पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि अदालतों में महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण, अलग कक्ष और बच्चों की देखभाल जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराना जरूरी है। साथ ही बार एसोसिएशनों में महिलाओं के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की आवश्यकता भी बताई।
उन्होंने कहा कि वास्तविक समानता वही है, जो लोगों के रोज़मर्रा के अनुभव में दिखाई दे, न कि केवल सिद्धांतों तक सीमित रहे।