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"सिर्फ ऐसा लगता था कि मेरी जिंदगी खत्म हो गई है...”, अवसाद से बाहर निकलने के लिए सानिया ने किस थेरेपी का सहारा लिया?

सानिया ने बताया कि ओलंपिक से बाहर हो जाने के कारण उनका करियर ही अनिश्चित हो गया था। उनकी कलाई में बिल्कुल भी ताकत नहीं बची थी।

By अंकिता दास, Posted by: प्रियंका कानू

Jan 21, 2026 20:39 IST

सानिया ने बताया कि ओलंपिक से बाहर हो जाने के कारण उनका करियर ही अनिश्चित हो गया था। उनकी कलाई में बिल्कुल भी ताकत नहीं बची थी। भारतीय टेनिस स्टार सानिया मिर्ज़ा ने हाल ही में एक पॉडकास्ट में खुलासा किया कि 2008 बीजिंग ओलंपिक के दौरान कलाई में गंभीर चोट लगने के बाद वह गहरे मानसिक अवसाद में चली गई थीं। चोट के कारण उन्हें ओलंपिक से हटना पड़ा, जिससे उनका करियर ही अनिश्चित हो गया था।

सानिया ने बताया कि उनकी कलाई की हालत इतनी खराब थी कि वह ठीक से बाल भी नहीं संवार पा रही थीं। उस दौर को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें सिर्फ यही लगता था कि उनकी जिंदगी खत्म हो गई है और शायद उनके माता-पिता भी उनसे निराश होंगे। यह उनके करियर में पहली बार था जब उन्हें ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा।

सानिया ने बताया कि वह करीब डेढ़ महीने तक खुद को घर में बंद रखती थीं। उन्हें किसी से मिलने का मन नहीं करता था और यहां तक कि वह अपने माता-पिता से भी ठीक से बात नहीं करती थीं। वह भयानक अकेलेपन और अवसाद में डूब गई थीं। हालांकी इतने गहरे अवसाद के बावजूद टेनिस ही उनके लिए मानसिक सहारा बना रहा। सानिया ने कहा कि उस समय वह खुद से भी प्यार नहीं कर पा रही थीं लेकिन जब भी वह कोर्ट पर उतरती थीं, उन्हें अच्छा महसूस होता था और खुशी मिलती थी।

इस पॉडकास्ट में सानिया के साथ मनोचिकित्सक डॉक्टर श्याम भट्ट भी मौजूद थे। उन्होंने कहा कि उन्होंने देखा है कि कई सफल लोगों में अवसाद और मानसिक पीड़ा अलग तरीके से सामने आती है। वे अपनी अंदरूनी तकलीफ को काम में झोंक देते हैं। बाहर से देखने पर सब कुछ सामान्य लगता है लेकिन भीतर वे खुद से एक कठिन लड़ाई लड़ रहे होते हैं।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि हाई फंक्शनिंग लोग अक्सर यह समझ ही नहीं पाते कि वे मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। उनकी जिंदगी इतनी रूटीन आधारित और बाहरी अपेक्षाओं को पूरा करने में व्यस्त होती है कि उनकी मानसिक पीड़ा दब जाती है। यह जानबूझकर नहीं बल्कि एक तरह की सर्वाइवल स्ट्रेटेजी होती है।

विशेषज्ञों की सलाह है कि नींद की समस्या, हर समय चिड़चिड़ापन, भावनाओं का सुन्न हो जाना या लगातार दबाव में रहना जैसे संकेतों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जीवनशैली और व्यवहार में ऐसे बदलाव यह बताते हैं कि अब थेरेपी की जरूरत है। कई बार थोड़ा ब्रेक लेना या अपने काम की दुनिया से बाहर किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना भी मददगार हो सकता है।

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