नयी दिल्लीः Eternal Group में हुआ हालिया नेतृत्व परिवर्तन केवल एक पद परिवर्तन नहीं, बल्कि कंपनी के अगले विकास चरण और गवर्नेंस स्ट्रक्चर की दिशा को स्पष्ट करता है। संस्थापक दीपिंदर गोयल का Group CEO पद से हटना और अलविंदर सिंह ढींडसा का नया CEO बनना, इस बात का संकेत है कि कंपनी अब उद्यमी प्रयोगों से आगे बढ़कर अधिक अनुशासित, ऑपरेशन-ड्रिवन पब्लिक कंपनी मॉडल की ओर बढ़ रही है।
कंपनी की नियामक सूचना के अनुसार, गोयल बोर्ड में वाइस चेयरमैन की भूमिका निभाएंगे, जबकि दैनिक संचालन और रणनीतिक क्रियान्वयन की जिम्मेदारी ढींडसा के हाथों में होगी।
गोयल का फैसला: व्यक्तिगत प्रयोग या कॉरपोरेट मजबूरी?
दीपिंदर गोयल ने अपने फैसले के पीछे जिस कारण का उल्लेख किया है, वह भारत की स्टार्टअप दुनिया में एक परिचित दुविधा को उजागर करता है-क्या एक फाउंडर पब्लिक कंपनी के CEO रहते हुए उच्च जोखिम वाले प्रयोग कर सकता है?
गोयल के अनुसार, वे ऐसे नए विचारों पर काम करना चाहते हैं जिनमें बड़े पैमाने पर प्रयोग और असफलता की संभावना शामिल है। पब्लिक कंपनी में, जहां शेयरधारकों, नियामकों और बाजार की अपेक्षाएं जुड़ी होती हैं, ऐसे प्रयोगों के लिए सीमित गुंजाइश रहती है। यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि Eternal अब नवाचार से अधिक स्थिरता और पूर्वानुमेय विकास पर जोर देना चाहती है।
पब्लिक कंपनी की अपेक्षाएं और CEO की भूमिका
भारत में सूचीबद्ध कंपनियों के लिए CEO की भूमिका केवल ग्रोथ तक सीमित नहीं होती। इसमें नियामकीय अनुपालन, कॉरपोरेट गवर्नेंस, निवेशकों के साथ संवाद और जोखिम प्रबंधन भी शामिल है। गोयल का यह कहना कि पब्लिक कंपनी के CEO से “सिंगुलर फोकस” की अपेक्षा होती है, यह दर्शाता है कि Eternal अब नेतृत्व से पूर्ण ऑपरेशनल समर्पण चाहती है।
यह बदलाव निवेशकों को यह भरोसा देने की कोशिश भी है कि कंपनी का नेतृत्व स्पष्ट रूप से जवाबदेह और संरचित रहेगा।
अलबिंदर ढींढसा की नियुक्ति के असली मायने
अलबिंदर ढींढसा का CEO बनना केवल उत्तराधिकारी चयन नहीं, बल्कि रणनीतिक संकेत भी है। ढींडसा ने Blinkit को अधिग्रहण के बाद न केवल स्थिर किया, बल्कि उसे ब्रेकईवन तक पहुंचाया। इससे यह संकेत मिलता है कि Eternal आने वाले वर्षों में क्विक कॉमर्स और ऑपरेशनल एफिशिएंसी को अपनी प्रमुख ग्रोथ लीवर मान रही है।
ढींडसा का अनुभव टीम बिल्डिंग, सप्लाई चेन और ग्राउंड-लेवल एक्जीक्यूशन में रहा है, जो उस चरण के लिए अहम है, जिसमें Eternal अब प्रवेश कर चुकी है।
फाउंडर की भूमिका में बदलाव, लेकिन नियंत्रण बना रहेगा
हालांकि गोयल ने CEO पद छोड़ा है, लेकिन वे कंपनी के रणनीतिक निर्णयों से पूरी तरह अलग नहीं होंगे। वाइस चेयरमैन के रूप में उनकी भूमिका लॉन्ग-टर्म विजन, लीडरशिप डेवलपमेंट, संस्कृति और गवर्नेंस तक सीमित रहेगी।
यह मॉडल वैश्विक टेक कंपनियों में आम रहा है, जहां फाउंडर रणनीतिक मार्गदर्शक की भूमिका में रहते हुए ऑपरेशनल कमान प्रोफेशनल मैनेजमेंट को सौंप देते हैं।
ESOP और गवर्नेंस संकेत
गोयल के अनवेस्टेड ESOP को ESOP पूल में वापस करना यह संकेत देता है कि कंपनी भविष्य के नेतृत्व को प्रोत्साहित करने और प्रतिभा बनाए रखने पर फोकस कर रही है, बिना शेयरधारकों पर अतिरिक्त दबाव डाले। यह कदम कॉरपोरेट गवर्नेंस के लिहाज से भी सकारात्मक माना जा रहा है।
Eternal का अगला चरण
2008 में शुरू हुई कंपनी आज फूड डिलीवरी से आगे बढ़कर क्विक कॉमर्स और अन्य डिजिटल सेवाओं में मौजूद है। नेतृत्व परिवर्तन यह दर्शाता है कि Eternal अब “फाउंडर-ड्रिवन स्टार्टअप” से आगे निकलकर “प्रोफेशनली मैनेज्ड पब्लिक एंटरप्राइज” बनने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
यह देखना अहम होगा कि ढींडसा के नेतृत्व में कंपनी ऑपरेशनल मजबूती और लाभप्रदता के बीच किस तरह संतुलन साधती है, और क्या गोयल की रणनीतिक मौजूदगी कंपनी को लंबे समय में प्रतिस्पर्धी बनाए रख पाती है।