कोलकाताः भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को लेकर जागरूकता बढ़ने के बावजूद इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) को अपनाने की रफ्तार पर अब भी गलतफहमियों का ब्रेक लगा हुआ है। ओला इलेक्ट्रिक की एक नई देशव्यापी स्टडी के अनुसार, ज्यादातर उपभोक्ता EV को एक कैटेगरी के तौर पर तो पहचानते हैं, लेकिन इसके वास्तविक आर्थिक और तकनीकी फायदों को गंभीर रूप से कम आंकते हैं। यही वजह है कि आंतरिक दहन इंजन (ICE) वाले वाहनों से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर अपेक्षित तेजी नहीं आ पा रही है।
अध्ययन में सामने आया है कि बड़ी संख्या में लोग यह मानते हैं कि इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर पेट्रोल वाहनों की तुलना में सिर्फ 20 से 50 प्रतिशत तक ही सस्ते पड़ते हैं, जबकि वास्तविक परिस्थितियों में EV का रनिंग कॉस्ट बैटरी तकनीक और इस्तेमाल के आधार पर 90 प्रतिशत तक कम हो सकता है। यह अंतर रोजमर्रा की आवाजाही के खर्च को पूरी तरह बदल देता है, लेकिन इसकी सही जानकारी आम ग्राहकों तक नहीं पहुंच पा रही है।
स्टडी के मुताबिक EV अपनाने में सबसे बड़ी रुकावट ऊंची कीमत नहीं, बल्कि रेंज को लेकर चिंता और लंबी अवधि की विश्वसनीयता पर संदेह है। अधिकांश उपभोक्ताओं का मानना है कि EV की रेंज 100 से 150 किलोमीटर तक सीमित होती है, जबकि बाजार में उपलब्ध कई इलेक्ट्रिक स्कूटर्स 300 किलोमीटर तक और इलेक्ट्रिक मोटरसाइकिलें 500 किलोमीटर तक की रेंज देने में सक्षम हैं। इसके बावजूद देशभर में EV की परफॉर्मेंस और वास्तविक रेंज को लेकर समझ बेहद कमजोर बनी हुई है।
रिपोर्ट का अहम पहलू यह भी है कि ये गलतफहमियां केवल शुरुआती स्तर तक सीमित नहीं हैं। EV खरीदने पर गंभीरता से विचार कर रहे उपभोक्ता भी रेंज और लागत में होने वाली बचत को कम आंकते हैं। इससे संकेत मिलता है कि गलत जानकारी खरीद के अंतिम फैसले तक बनी रहती है और यही EV अपनाने की गति को धीमा कर रही है।
ओला इलेक्ट्रिक की स्टडी के अनुसार, भारत में EV को अब पेट्रोल वाहनों के केवल थोड़ा सस्ते विकल्प के तौर पर देखने की सोच से बाहर निकलने की जरूरत है। EV को एक ऐसे बेहतर मोबिलिटी समाधान के रूप में समझाया जाना चाहिए, जो न सिर्फ काफी कम रनिंग कॉस्ट देता है, बल्कि लंबी वास्तविक रेंज और इंजीनियर्ड विश्वसनीयता भी प्रदान करता है। अध्ययन में यह भी कहा गया है कि वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) जैसी जीवन गुणवत्ता से जुड़ी समस्याओं का समाधान बड़े पैमाने पर EV अपनाने से ही संभव है।
इन गलत धारणाओं को दूर करने के लिए स्टडी में सुझाव दिया गया है कि EV निर्माता विज्ञापन से लेकर शोरूम अनुभव, ओनरशिप और सर्विस कम्युनिकेशन तक हर स्तर पर कैटेगरी बिल्डिंग पर ज्यादा जोर दें। जब तक EV के असली फायदे स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचेंगे, तब तक इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में बड़े बदलाव की उम्मीद करना मुश्किल रहेगा।