नई दिल्लीः केंद्रीय बजट 2026-27 से पहले वित्त मंत्रालय द्वारा साझा की गई कर सुधारों की प्रगति रिपोर्ट सिर्फ उपलब्धियों की सूची नहीं है, बल्कि यह संकेत भी देती है कि सरकार किस दिशा में टैक्स नीति को ले जाना चाहती है। हाल के वर्षों में किए गए प्रत्यक्ष कर सुधारों का मकसद साफ है-निवेश के लिए स्थिर और अनुमानित माहौल बनाना, विवाद कम करना और करदाताओं पर अनुपालन का बोझ घटाना। सवाल यह है कि इन सुधारों से वास्तव में किसे कितना फायदा हुआ है और आगे की चुनौतियां क्या हैं।
AIF: टैक्स स्पष्टता से निवेश को कितना बल?
वैकल्पिक निवेश कोष (AIF) से जुड़ा संशोधन सरकार की उस कोशिश को दर्शाता है, जिसमें वह निवेशकों को टैक्स को लेकर स्पष्टता देना चाहती है। कैटेगरी-I और कैटेगरी-II AIF द्वारा रखी गई सिक्योरिटीज को कैपिटल एसेट घोषित करना एक अहम बदलाव है, क्योंकि इससे इन फंड्स की आय अब बिजनेस इनकम के बजाय कैपिटल गेन मानी जाएगी।
यह कदम भारतीय AIF को विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के समान टैक्स ट्रीटमेंट देता है, जिससे घरेलू निवेश वाहनों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति बेहतर होती है। हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या इससे लॉन्ग-टर्म कैपिटल की आवक बढ़ती है और क्या टैक्स अधिकारियों व करदाताओं के बीच व्याख्या से जुड़े विवाद वास्तव में कम होते हैं।
स्टार्टअप टैक्स हॉलिडे: प्रोत्साहन या सीमित लाभ?
स्टार्टअप्स के लिए टैक्स हॉलिडे की समयसीमा 2030 तक बढ़ाना नीति स्तर पर एक सकारात्मक संकेत है। इससे सरकार का फोकस नवाचार और उद्यमिता को समर्थन देने पर दिखता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि टैक्स हॉलिडे का फायदा उन्हीं स्टार्टअप्स को मिलता है जो शुरुआती वर्षों में मुनाफा कमा पाते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या टैक्स छूट के साथ-साथ पूंजी उपलब्धता, अनुपालन की सरलता और बाजार तक पहुंच जैसे मुद्दों पर भी समान रूप से ध्यान दिया जा रहा है।
इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग: टैक्स से निवेश आकर्षण
धारा 44BBD के तहत गैर-निवासी कंपनियों के लिए प्रिज़म्पटिव टैक्सेशन भारत की मैन्युफैक्चरिंग रणनीति से जुड़ा अहम कदम है। 25 प्रतिशत की तय टैक्सेबल इनकम विदेशी कंपनियों के लिए निश्चितता लाती है और भारत में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को आसान बना सकती है।
हालांकि, यह भी देखना होगा कि क्या टैक्स इंसेंटिव अकेले वैश्विक कंपनियों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त हैं या फिर लॉजिस्टिक्स, स्किल और सप्लाई चेन जैसी चुनौतियों पर भी समानांतर सुधार जरूरी हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर और IFSC: दीर्घकालिक दृष्टिकोण
इनलैंड वेसल्स को टनैज टैक्स स्कीम में शामिल करना सरकार की लॉन्ग-टर्म इंफ्रास्ट्रक्चर सोच को दर्शाता है। अंतर्देशीय जल परिवहन न केवल लागत घटा सकता है, बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी बेहतर विकल्प है।
इसी तरह IFSC को टैक्स रियायतों का 2030 तक विस्तार यह संकेत देता है कि सरकार इस सेक्टर में स्थिरता और निरंतरता को प्राथमिकता दे रही है। लेकिन चुनौती यह है कि क्या भारत का IFSC वैश्विक वित्तीय केंद्रों से प्रतिस्पर्धा करने के लिए सिर्फ टैक्स इंसेंटिव से आगे बढ़ पाएगा।
आम करदाता: राहत बनाम राजस्व संतुलन
NSS निकासी को टैक्स फ्री करना, एनपीएस वात्सल्य में अतिरिक्त छूट और दो संपत्तियों पर निल एनुअल वैल्यू जैसी घोषणाएं राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से अहम हैं। ये कदम मध्यम वर्ग को सीधी राहत देते हैं और बचत को प्रोत्साहित करते हैं।
हालांकि, इससे सरकार के राजस्व पर पड़ने वाले असर और टैक्स बेस को चौड़ा करने की रणनीति के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती रहेगा।
विवाद कम करने की कोशिश: सिस्टम बदलेगा या नहीं?
ट्रांसफर प्राइसिंग के लिए तीन साल का ब्लॉक असेसमेंट और सेफ हार्बर नियमों का विस्तार टैक्स विवाद कम करने की दिशा में सकारात्मक कदम माने जा रहे हैं। सिद्धांत रूप में ये बदलाव मुकदमेबाजी घटा सकते हैं, लेकिन व्यवहार में इनकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि टैक्स प्रशासन इन्हें कितनी एकरूपता और पारदर्शिता से लागू करता है।
नीति की दिशा साफ, अमल की परीक्षा बाकी
बजट 2026 से पहले सामने आए टैक्स सुधार यह दिखाते हैं कि सरकार का फोकस निवेश-अनुकूल माहौल, नीति स्थिरता और अनुपालन सरलता पर है। हालांकि, इन सुधारों की असली परीक्षा उनके क्रियान्वयन और जमीनी असर में होगी। आने वाला बजट यह संकेत देगा कि सरकार इन पहलों को और गहराई देती है या नए क्षेत्रों में सुधार की दिशा तय करती है।