नयी दिल्लीः भारत को अमेरिका के नेतृत्व वाले गाज़ा शांति बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण मिला है, जिसकी अध्यक्षता डोनाल्ड ट्रंप कर रहे हैं। यह बोर्ड गाज़ा युद्ध के बाद वहां शांति, स्थिरता और पुनर्निर्माण की देखरेख के लिए बनाया गया है। लेकिन एक थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की रिपोर्ट कहती है कि यह प्रस्ताव भारत के लिए फायदेमंद होने के बजाय जोखिम भरा हो सकता है। GTRI भारत का एक थिंक टैंक है और व्यापार, प्रौद्योगिकी और निवेश से जुड़े मुद्दों पर शोध और रिपोर्ट जारी करता है। यह विशेष रूप से भारत के विकास और आर्थिक नीतियों के संदर्भ में अपनी रिपोर्ट देता है।
रिपोर्ट के अनुसार सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस बोर्ड में फिलिस्तीन की सीधी भागीदारी नहीं है। ऐसे में कोई भी फैसला बाहर से थोपा हुआ लगेगा और उसकी वैधता कमजोर होगी। इसके अलावा यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र से बाहर रहकर काम करेगा, जबकि भारत हमेशा संयुक्त राष्ट्र और बहुपक्षीय व्यवस्था का समर्थन करता रहा है।
रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि मानवीय मदद को सुरक्षा शर्तों से जोड़ने से गाज़ा में पीड़ित लोगों तक राहत पहुंचने में देरी हो सकती है। अब तक इस युद्ध में 30 हजार से ज्यादा फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं, ऐसे में मदद में देरी गंभीर समस्या बन सकती है।
एक और चिंता यह है कि यह बोर्ड काफी हद तक व्यावसायिक सोच से चलाया जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक डर है कि गाज़ा के पुनर्निर्माण में लोगों के अधिकारों के बजाय जमीन और मुनाफे वाली परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जा सकती है।
डोनाल्ड ट्रंप पहले भी गाज़ा को “मध्य पूर्व की रिवेरा” बनाने जैसी बातें कर चुके हैं और इसे अपने नियंत्रण में लेकर पुनर्विकसित करने का विचार दे चुके हैं। इन्हीं विचारों के आधार पर यह नया बोर्ड बनाया गया है। इस बोर्ड में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, ट्रंप के दामाद जेरेड कुश्नर और विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा जैसे कई बड़े नाम शामिल हैं।
अमेरिका ने गाज़ा के पुनर्निर्माण के लिए 1 अरब डॉलर देने की बात कही है, लेकिन यह पैसा भी सुरक्षा शर्तों से जुड़ा होगा। रिपोर्ट यह भी बताती है कि इज़राइल इस बोर्ड का औपचारिक सदस्य नहीं है, फिर भी सुरक्षा और अमल में उसका बड़ा प्रभाव रहेगा, जबकि फ़िलिस्तीन का इसमें कोई सीधा प्रतिनिधित्व नहीं है।
GTRI की राय है कि भारत को इस बोर्ड में शामिल होने से बचना चाहिए। भारत बिना सदस्य बने भी मानवीय मदद कर सकता है, जिससे उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि, बहुपक्षवाद और फिलिस्तीनी आत्मनिर्णय के समर्थन की विश्वसनीयता बनी रहेगी।