नई दिल्ली/तेहरान: वेस्ट एशिया में एक बार फिर संघर्ष की आहट सुनाई दे रही है। ईरान और अमेरिका अब खुलकर एक-दूसरे को धमकाना शुरू कर चुके हैं और लगभग आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही चेतावनी दी थी और विशाल नौसेना भेजी थी, साथ ही कहा था कि अगर न्यूक्लियर डील पर सहमति नहीं बनी तो वेनेजुएला से भी बड़ा सैन्य ऑपरेशन हो सकता है।
बुधवार को ईरान ने इसका जवाब दिया। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने चेतावनी दी कि उनकी सेना हमेशा ‘ट्रिगर पर उंगली’ रखती है। अगर ईरान के जल, स्थलीय या हवाई क्षेत्र में कोई हमला होता है, तो इसका कड़ा जवाब दिया जाएगा। सीधे तौर पर अमेरिका या ट्रंप का नाम नहीं लिया गया, लेकिन माना जा रहा है कि उनका निशाना अमेरिका ही है।
हालांकि, ईरानी विदेश मंत्री ने बातचीत के लिए दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया। उन्होंने कहा कि अगर कोई पक्षपात नहीं होगा तो ईरान न्यूक्लियर डील पर चर्चा करने के लिए तैयार है। अराघची का कहना है कि समझौते से दोनों पक्षों को बराबरी का लाभ मिलना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी तरह की जोर-जबरदस्ती, धमकी या डराने-धमकाने की कोशिश स्वीकार्य नहीं है।
अराघची ने सोशल मीडिया पर यह भी कहा कि ईरान न्यूक्लियर हथियार नहीं बनाना चाहता, लेकिन शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए न्यूक्लियर गतिविधियों का अधिकार बनाए रखना उसका हक है और इसे डील में स्पष्ट रूप से सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
विशेषज्ञों के एक हिस्से ने इस पर संदेह जताया कि क्या ट्रंप इस तरह की शर्तों को स्वीकार करेंगे, क्योंकि उन्होंने लगातार ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। ईरान का दावा है कि हाल ही में देश में शुरू हुए सरकार-विरोधी आंदोलनों में अमेरिका की प्रत्यक्ष मदद और समर्थन शामिल था। इसी बीच, अमेरिकी युद्धपोत ‘अब्राहम लिंकन’ वेस्ट एशिया के पास समुद्र में पहुंचा और दबाव बनाए रखने की कोशिश की।
अब सवाल उठता है कि क्या अमेरिका वेनेजुएला की तरह ईरान में भी शासन परिवर्तन की योजना बना रहा है। यदि ईरानी शासन गिर गया, तो देश की कमान किसके हाथ में जाएगी? अमेरिकी सीनेट समिति की सुनवाई में विदेश सचिव मार्क रुबियो ने कहा कि वेनेजुएला की तरह ईरान में भी सरकार बदलना आसान नहीं है और मामला जटिल है। वर्तमान शासकीय व्यवस्था गिरने पर परिणामों का कोई स्पष्ट अनुमान फिलहाल नहीं है।