ओटावाः अब अमेरिका की ‘दादागीरी’ और बर्दाश्त नहीं की जा रही। डोनाल्ड ट्रंप की लगातार धमकियों और टैरिफ युद्ध के दबाव में इस बार ओटावा की विदेश नीति में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। कनाडा के नए प्रधानमंत्री मार्क कार्नी अमेरिका की छाया से बाहर निकलकर अब भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाने जा रहे हैं। पिछले दो वर्षों की कूटनीतिक कड़वाहट को भुलाकर भारत के साथ नए सिरे से रिश्ते बनाने के लिए कार्नी जल्द ही नई दिल्ली आने वाले हैं।
‘हम अमेरिका का 51वां राज्य नहीं बनेंगे’
हालात कितने गंभीर हैं यह कनाडा की विदेश मंत्री अनिता आनंद के बयान से साफ हो जाता है। ट्रंप कई बार कनाडा को अमेरिका का ‘51वां राज्य’ बनाने की धमकी दे चुके हैं। इसके जवाब में अनिता आनंद ने स्पष्ट कहा है कि कनाडा किसी भी हालत में अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा।
इस अस्तित्व की लड़ाई में कनाडा को भारत की ज़रूरत है। चीनी उत्पादों पर ट्रंप की सख्ती और भारी शुल्क के चलते कनाडा की अर्थव्यवस्था दबाव में है। ऐसे में वह भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था को नए बाज़ार के रूप में देख रहा है।
कार्नी का दौरा और बड़े समझौते के संकेत
सूत्रों के मुताबिक, भारत का केंद्रीय बजट पेश होने के बाद, संभवतः मार्च के पहले सप्ताह में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी भारत दौरे पर आएंगे। लक्ष्य है द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाकर 50 अरब डॉलर तक ले जाना।
इस दौरे में यूरेनियम, ऊर्जा संसाधन, खनिज और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को लेकर कई मेगा समझौते हो सकते हैं। गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और कनाडा की विदेश मंत्री के बीच हुई ‘सार्थक’ बातचीत के बाद ही इस दौरे की पृष्ठभूमि तैयार हुई है।
भारत को क्या फायदा होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समीकरण भारत के लिए भी बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है। कूटनीतिक विश्लेषकों के अनुसार ट्रंप की टैरिफ नीति के कारण भारत पर भी दबाव है। ऐसे में G7 समूह के किसी देश का स्वेच्छा से भारत से दोस्ती बढ़ाना भारत की कूटनीतिक जीत मानी जा रही है।
इसके अलावा कनाडा से तेल, गैस और यूरेनियम मिलने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी। यूरोपीय संघ के साथ ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ और कनाडा की यह पहल दोनों मिलकर 2026 को भारत की अर्थव्यवस्था के लिए ‘गेम चेंजर’ बना सकती हैं।
जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल में भारत और कनाडा के रिश्तों में काफी ठंडापन आ गया था लेकिन मार्क कार्नी के दौर में यह जमी बर्फ पिघलनी शुरू हो गई है। ट्रूडो युग की ठंडक को खत्म कर कार्नी युग की यह नई दोस्ती ट्रंप के दबाव को कितना झेल पाएगी, अब यही देखना बाकी है।