ईरान पर डोनाल्ड ट्रंप का ‘एपिक फ्यूरी’ टूट पड़ा है। युद्ध के पहले ही दिन अमेरिकी-इजरायली बलों ने खामेनेई और IRGC के शीर्ष नेतृत्व का काम तमाम कर दिया है जिससे ईरान को बड़ा झटका लगा है। पिछले 3 दिनों से लगातार युद्ध चल रहा है कि इसकी तेजी कम होने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं। बल्कि यह संघर्ष लगातार नए-नए इलाकों में फैलता जा रहा है।
लगभग पूरा पश्चिम एशिया युद्ध की आग में जल रहा है। इसके साथ-साथ युद्ध का खर्च भी तेजी से बढ़ता जा रहा है।
अगर हम युद्ध के मैदान की जीत-हार को अलग रखकर केवल हिसाब-किताब देखें तो साफ दिखाई देता है कि इस युद्ध के हर एक सेकंड की कीमत अमेरिकी करदाताओं पर भारी पड़ रही है।
घातक हथियारों की मार, जेब पर भारी वार
अधिकांश सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि ईरान के साथ युद्ध लंबा खिंच सकता है। वहीं दूसरी ओर अमेरिकी अर्थशास्त्रियों की चिंता भी बढ़ती जा रही है। केंट स्मेटर्स का कहना है कि इस संघर्ष की वजह से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को जितना बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा उसका आंकड़ा सुनकर चौंक जाएंगे। दरअसल, युद्ध शुरू होने से कुछ दिन पहले ही जब ट्रंप ने फारस की खाड़ी में युद्धपोत और लड़ाकू विमान तैनात करने शुरू किए थे तभी अमेरिकी करदाताओं के लाखों डॉलर खर्च हो चुके थे।
सिर्फ सैन्य उपकरण और गोला-बारूद पर ही खर्च नहीं बढ़ रहा है बल्कि युद्ध के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी धीमी पड़ गई है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इसके दूरगामी प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।
पहले 24 घंटों का ‘बड़ा बिल’
अमेरिका ने इस युद्ध में अपने भंडार के सबसे घातक और आधुनिक हथियार उतार दिए हैं। आसमान को हिला देने वाले B-1 स्टेल्थ बॉम्बर से लेकर F-22 और F-35 जैसे लड़ाकू विमान तक - इन सभी को उड़ाने के पीछे भारी रखरखाव और ईंधन खर्च जुड़ा हुआ है।
युद्ध के पहले ही दिन अमेरिका के कुल रक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा सरकारी खजाने से खर्च हो गया।
रणभूमि की तस्वीर यह भी बताती है कि सिर्फ ईरान को ही नुकसान नहीं हो रहा है। कुवैत में ‘फ्रेंडली फायर’ की घटना में अमेरिका ने अपने तीन अत्याधुनिक F-15E लड़ाकू विमान खो दिए। इन विमानों की मौजूदा बाजार कीमत बेहद ऊंची बताई जाती है।
ईंधन बाजार में चल रहा है ‘विश्व युद्ध’
युद्ध का प्रभाव अब रणक्षेत्र से निकलकर आम लोगों की रसोई तक पहुंच गया है। ईरान के जवाबी हमलों के कारण पश्चिम एशिया के कई तेल और गैस उत्पादन केंद्र लगभग ठप हो गए हैं। होर्मुज़ प्रणाली जहां से दुनिया के कुल तेल का लगभग 5वां हिस्सा गुजरता है, वहां इस समय टैंकरों की लंबी कतार लगी हुई है।
इसका नतीजा साफ है कि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ने वाली हैं। वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि इस ईंधन संकट से अमेरिका को जो व्यापारिक नुकसान होगा वह सीधे युद्ध के खर्च से भी कहीं ज्यादा हो सकता है।
घर में बढ़ रही है महंगाई
अमेरिका के भीतर की स्थिति भी ठीक नहीं है। जब ट्रंप बाहर युद्ध लड़ रहे हैं तब देश के अंदर आम लोग महंगाई और जीवन-यापन की बढ़ती लागत से परेशान हैं। ऐसे में इस युद्ध पर हो रहा भारी खर्च आम अमेरिकी नागरिक कितना स्वीकार करेंगे, यह एक बड़ा सवाल बन गया है।
हाल की एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार केवल गिने-चुने लोग ही इस हमले के समर्थन में हैं। जैसे-जैसे युद्ध बढ़ेगा, क्या ट्रंप का ‘रणघोष’ उनके लिए ही उलटा पड़ जाएगा? खामेनेई के बिना भी ईरान जिस तरह से प्रतिरोध कर रहा है, उसे देखते हुए इस युद्ध की अंतिम कीमत क्या होगी, इसका अनुमान लगाना फिलहाल मुश्किल ही लग रहा है।