नई दिल्ली: घर खरीदना भारतीय परिवारों के लिए अक्सर सबसे बड़ा वित्तीय निर्णय होता है और पिछले एक दशक में यह और भी जटिल हो गया है। इकोनॉमिक सर्वे 2025–26 के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस वर्षों में देश के व्यक्तिगत हाउसिंग लोन की राशि तीन गुना से भी अधिक बढ़ गई है। मार्च 2015 में इस ऋण की राशि लगभग 10 लाख करोड़ रुपये थी, जो मार्च 2025 में बढ़कर 37 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गई है।
इस बढ़ोतरी के परिणामस्वरूप देश के सकल घरेलू उत्पाद में हाउसिंग लोन का हिस्सा भी बढ़ा है। 8 प्रतिशत से शुरू होकर यह अब 11 प्रतिशत से भी अधिक हो गया है। इसका मतलब है कि भारत का हाउसिंग बाजार अब वित्तीय प्रणाली पर अधिक निर्भर होता जा रहा है। सरल शब्दों में कहा जाए तो अब अधिक परिवार बैंक ऋण के माध्यम से घर खरीद रहे हैं और लंबी अवधि की किस्तों की योजना में प्रवेश कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रवृत्ति केवल घरों की कीमतों के बढ़ने की कहानी नहीं है। यह इस बात को भी दर्शाती है कि परिवार संपत्ति बनाने की अपनी योजना धीरे-धीरे बदल रहे हैं। हाउसिंग लोन आमतौर पर 15 से 25 वर्षों की अवधि के लिए लिया जाता है। इसका मतलब है कि परिवारों को अपनी आय, बचत और खर्च की योजना लंबी अवधि तक बनानी पड़ती है। कई परिवारों के लिए मासिक ईएमआई वित्तीय जीवन का केंद्र बनती जा रही है। सेवानिवृत्ति, बच्चों की पढ़ाई, बीमा और निवेश जैसे फैसले अब इस ईएमआई के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं।
पहले घर खरीदने के मामले में कई विकल्प मौजूद थे। यह बड़ी राशि की बचत से हो सकता था, परिवार के पैसों से या अनौपचारिक उधार लेकर। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। घर खरीदने में लंबी अवधि की, संरचित ईएमआई पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। ऋण अब सत्यापित आय के आधार पर ही मिल रहा है, जिससे हाउसिंग मार्केट नकद-निर्भर से क्रेडिट-निर्भर होता जा रहा है।
जब हाउसिंग लोन का हिस्सा GDP के 8 प्रतिशत से बढ़कर 11 प्रतिशत से अधिक हो जाता है, तो यह संकेत देता है कि होम लोन अर्थव्यवस्था की तुलना में तेजी से बढ़ रहे हैं और राष्ट्रीय आय और ऋण का बड़ा हिस्सा अब हाउसिंग सेक्टर की ओर जा रहा है।